देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब का नज़ारा हर जगह और हर दौर में देखने को मिलता है। विविधताओं और मतभेदों के बावजूद दो बड़े समुदाय एक-दूसरे के सुख-दुख में हमेशा साथ खड़े रहे हैं। मध्यप्रदेश के बैतूल में आज भी इसी परंपरा की झलक रामलीला और दशहरे के आयोजन में साफ दिखाई देती है, जहां मुस्लिम परिवार न सिर्फ भागीदारी निभा रहे हैं, बल्कि त्योहार के उत्साह को दोगुना कर रहे हैं। बैतूल के आजाद वार्ड में रहने वाले 30 वर्षीय आबू भाई तीन पीढ़ियों से रामलीला की राम बारात और दशहरे में रावण का रथ सजाने का काम करते आ रहे हैं। दादा और बड़े भाई से मिली इस परंपरा को अब आबू आगे बढ़ा रहे हैं। हर नवरात्र में वह अपने घोड़ों को नहलाकर, बग्घी को सजाकर, रथ को तैयार करते हैं और इसे रामलीला मंच तक पहुंचाते हैं। आबू कहते हैं हिन्दू भाइयों के लिए यह सब करना हमें खुशी देता है। दादा और भाई ने यह जिम्मेदारी निभाई, अब मैं इसे आगे बढ़ा रहा हूं। दरअसल, आबू का पुश्तैनी धंधा ही घोड़ा-गाड़ी चलाना रहा है। पहले जब बग्घी नहीं थी, तब उनके बड़े भाई घोड़ों को सजाकर रामलीला में भेजा करते थे।
68 साल पुरानी परंपरा, पाकिस्तान से बैतूल तक
रामलीला का यह आयोजन श्रीकृष्ण पंजाबी सेवा समिति द्वारा कराया जाता है। समिति के सदस्य दीपू सलूजा बताते हैं कि यह परंपरा 68 साल पहले अविभाजित भारत (अब पाकिस्तान) में शुरू हुई थी। विभाजन के बाद समिति बैतूल आई और यहां भी उसी परंपरा को निभाया जा रहा है। सलूजा कहते हैं- रावण के पुतले बनवाने से लेकर राम बारात की बग्घी और बेरिकेडिंग तक, मुस्लिम समाज का योगदान हमेशा से रहा है। यह आयोजन हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है। दर्शक भी गवाह हैं भाईचारे के
रामलीला के दर्शकों में भी मुस्लिम समुदाय की भागीदारी बड़ी संख्या में रहती है। स्थानीय निवासी तौसीफ अकबानी कहते हैं बचपन में हम मैदान में बोरा बिछाकर सीट रिजर्व करते थे, ताकि रामलीला न छूटे। आज भी वही उत्साह है। यहां किसी तरह का कोई विवाद नहीं है। सोशल मीडिया और कुछ खबरें ही माहौल खराब करती हैं, वरना यहां हिंदू-मुस्लिम समाज में खूब प्रेम है। गंगा-जमुनी तहज़ीब की तस्वीर
बैतूल की यह तस्वीर बताती है कि देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब कितनी मजबूत है। दशकों से चली आ रही यह परंपरा यह संदेश देती है कि भाईचारा और सामाजिक समरसता किसी विवाद या मतभेद से नहीं टूट सकती।


