आईएफयूएमबी और एएफएसयूएमबी के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित 33वीं वार्षिक कॉन्फ्रेंस यूएसकॉन 2025 की शुक्रवार से शुरुआत हुई। इसमें देश-दुनिया के एक्सपर्ट रूबरू हो रहे है। इसमें एक्सपर्ट ने कहा कि एंडोमेट्रियोसिस जैसी महिलाओं की प्रजनन समस्या के निदान में जल्द और आसान तरीका विकसित हो रहा है। हाल के शोध के अनुसार, अब लार (सलाइवा) के जरिए एंडोमेट्रियोसिस का परीक्षण किया जा सकता है। अभी इस पर परीक्षण चल रहा है, लेकिन जल्द ही लोगों के लिए यह जांच उपलब्ध हो जाएगी। कॉन्फ्रेंस के ऑर्गेनाइजिंग चेयरमैन डॉ. डीएस नरूका और डॉ. विनोद गुप्ता ने बताया कि कॉन्फ्रेंस के पहले दिन हुए वैज्ञानिक सत्रों में देशभर के नामी विशेषज्ञों ने अल्ट्रासाउंड की नई तकनीकों और शोधों पर चर्चा की। डॉ. अशोक खुराना ने अल्ट्रासाउंड में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका पर व्याख्यान दिया। डॉ. सुदर्शन ने प्लासेंटा एक्रेटा डिसऑर्डर पर, डॉ. कनु बाला ने इंट्रा पार्टम सोनोग्राफी, डॉ. पीके शाह ने एब्नार्मल यूट्रीन ब्लीडिंग पर सेशन दिया। ट्रेजरार डॉ. महावीर गोयल ने बताया कि इस दौरान वर्कशॉप भी आयोजित की गई, जिसमें स्टूडेंट्स को सिम्युलेटर पर अल्ट्रासाउंड करना सिखाया गया। आरएनए बायोमार्कर्स से चलेगा बीमारी का पता
अमेरिका से आए डॉ. स्कॉट यंग ने बताया कि लार में मौजूद एमआई आरएनए और पीआई आरएनए जैसे बायोमार्कर्स एंडोमेट्रियोसिस के संकेत दे सकते हैं। इन बायोमार्कर्स की पहचान से रोग के शुरुआती चरण में ही निदान संभव है। इस विधि की संवेदनशीलता 95 प्रतिशत से अधिक और सटीकता भी लगभग उतनी ही है, जिससे महिलाओं को बार-बार सर्जरी या दर्दनाक परीक्षण से बचाया जा सकता है। हाइयर फ्रिक्वेंसी प्रॉब्स से मिलेंगी डायनेमिक इमेज, साफ दिखेगी संरचना
फ्रांस से आए डॉ. थॉमस कोरॉलर ने बताया कि स्पोर्ट्स इंजरी या पेरिफेरल नर्व की जांच में मस्क्युलोस्केलेटल अल्ट्रासाउंड में आजकल हाइयर फ्रिक्वेंसी प्रॉब्स की अहमियत बढ़ती जा रही है। इन प्रॉब्स से ली गई डायनेमिक इमेजिंग डॉक्टर को न सिर्फ सतही स्ट्रक्चर देखने का मौका देती है, बल्कि रियल टाइम में मूवमेंट को भी समझने में मदद करती है। मसल्स, टेंडन, लिगामेंट और जॉइंट कैप्सूल जैसी संरचनाओं को हायर फ्रिक्वेंसी प्रॉब से बेहद स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है। इसके साथ ही जब रोगी को हलचल कराई जाती है तो टेंडन ग्लाइडिंग, स्नैपिंग, सबलक्सेशन, नर्व एंट्रैपमेंट जैसी स्थितियों का प्रत्यक्ष अवलोकन संभव हो जाता है। डायनेमिक इमेजिंग के चलते यह तकनीक अब क्लिनिकल एग्जामिनेशन से भी ज्यादा सटीकता के साथ निदान देने लगी है। महिलाओं में ओवरी कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और अक्सर यह बीमारी देर से पकड़ी जाती है। अब ओ-रैड्स तकनीक की मदद से इस बीमारी को शुरुआती स्टेज में ही पहचाना जा सकता है। इस तकनीक से मरीज को स्कोर दिया जाता है जिसके अनुरूप उसे कैंसर होने की संभावना को तय किया जाता है। नई तकनीक से बांटी गई जोखिम की पांच श्रेणियां
अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से आईं डॉ. प्रियंका झा ने बताया कि अल्ट्रासाउंड जांच के दौरान ओ-रैड्स स्कोरिंग सिस्टम अपनाने से ओवरी में बन रही गाँठ या सिस्ट को सामान्य, सौम्य अथवा कैंसर के जोखिम वाली श्रेणी में बांटना आसान हो जाता है। इसमें पांच श्रेणियां होती हैं जिसमें स्कोर 1 और 2 आने पर सामान्य स्थिति, स्कोर 3 होने पर अतिरिक्त जांच आवश्यक, एवं 4 और 5 स्कोर होने पर कैंसर की 50 प्रतिशत से अधिक संभावना होती है और उसे तुरंत विशेषज्ञ को रैफर किया जाता है। इस तकनीक से ओवरी कैंसर के लगभग 70 से 80 प्रतिशत मामले शुरुआती अवस्था में ही पकड़े जा सकते हैं। इससे रोगी को समय पर सर्जरी, दवा या अन्य विशेष उपचार उपलब्ध हो जाता है और जीवन बचाने की संभावना बढ़ जाती है।


