नीमच शहर की ग्वालटोली स्थित बंगाली कॉलोनी में पांच दिवसीय दुर्गा पूजा महोत्सव ‘सिंदूर खेला’ परंपरा के साथ संपन्न हुआ। शुक्रवार देर रात मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया गया। यह परंपरा बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। बंगाली समाज की सदस्य झूनू देवनाथ ने बताया कि ‘सिंदूर खेला’ दुर्गा पूजा से जुड़ी लगभग 400 वर्ष पुरानी प्रथा है। विजयादशमी के अवसर पर विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करने के बाद एक-दूसरे के गाल, माथे और मांग में सिंदूर लगाती हैं। यह रस्म दांपत्य जीवन में सुख, समृद्धि और पति की लंबी आयु की कामना का प्रतीक मानी जाती है। ग्वालटोली बंगाली समाज की ओर से इस साल भी दुर्गा पूजा का आयोजन पश्चिम बंगाल की तर्ज पर धूमधाम से किया गया। कोलकाता से आए मूर्तिकार और पुजारी ने कराई पूजा मां दुर्गा की प्रतिमाएं विशेष रूप से कोलकाता से आए मूर्तिकारों ने तैयार की, और पूजा-अर्चना के लिए बंगाल से विशेष पुजारी आमंत्रित किए गए थे। पांच दिनों तक चले इस महोत्सव में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का पालन किया गया। पूजा पंडाल में प्रतिदिन विशेष भक्ति कार्यक्रम, आरती और प्रसादी वितरण हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। पांच दिवसीय आयोजन में श्रद्धालुओं ने लिया हिस्सा पांच दिवसीय आयोजन के अंतिम दिन देवी की विदाई से ठीक पहले ‘सिंदूर खेला’ की रस्म निभाई गई। इसके बाद, मां दुर्गा की प्रतिमा का भव्य चल समारोह निकाला गया। यह चल समारोह शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए ग्वालटोली के समीप स्थित जलाशय तक पहुंचा। वहां पूरे विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ माता दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया गया। इस दौरान बंगाली समुदाय ने मां दुर्गा को अगले साल फिर आने का वादा लेकर विदा किया।


