राजस्थान के झालावाड़ जिले का पनवाड़ क्षेत्र आज गांवों की सीमाओं से निकलकर वैश्विक नक्शे पर अपनी अलग पहचान बना रहा है। यहां की मिट्टी से उपजने वाला सुगंधित धान दिल्ली–मुंबई जैसे महानगरों की थालियों से होता हुआ खाड़ी देशों (इराक, ईरान, कुवैत और सऊदी अरब) तक पहुंच रहा है। इस बार करीब 8 हजार हेक्टेयर में किसानों ने धान की खेती की है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस फसल की खुशबू सीमाएं पार कर रही है, उसके असली लाभ से स्थानीय किसान वंचित हैं। क्योंकि पनवाड़ और आसपास के क्षेत्रों में एक भी चावल मिल नहीं है। मजबूरी में किसान अपनी उपज कोटा और बूंदी की मंडियों में भेजने को विवश हैं, जहां बिचौलिये मुनाफा कमा जाते हैं और किसानों को उनकी मेहनत का पूरा मूल्य नहीं मिल पाता। जिले में धान उत्पादन का विस्तार जिले में धान की सबसे अधिक पैदावार खानपुर उपखंड के पनवाड़ और दही खेड़ा क्षेत्रों में होती है। इसके अलावा अकलेरा के गेहूं खेड़ी और झालरापाटन के कुछ इलाकों में भी धान की बुवाई की जाती है। इस वर्ष बासमती की 52 किस्मों (जैसे पूसा वन, 101, 1692, 1718, 1509, 1847, सुगंधा, शरबती, पूसा 4 और करीना) की रोपाई की गई है। धान की रोपाई जून के अंतिम सप्ताह से शुरू होती है। स्थानीय मजदूरों की कमी के चलते बिहार, बंगाल और मध्य प्रदेश से बड़ी संख्या में मजदूर पनवाड़ आते हैं। वे रोपाई से लेकर कटाई तक के काम में जुटते हैं। कटाई के मौसम में ये मजदूर रोजाना 1 हजार रुपए तक कमा लेते हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार हो रहा है। किसानों तक नहीं पहुंचता लाभ पनवाड़ का धान पहले कोटा, बूंदी और जयपुर की राइस मिलों में तैयार होता है। इसके बाद कोटा के व्यापारी इसे खाड़ी देशों में निर्यात करते हैं। बढ़ती मांग के चलते निर्यातक किसानों से बड़ी मात्रा में धान खरीदते हैं, लेकिन लाभ का बड़ा हिस्सा व्यापारियों और मिल मालिकों को मिलता है। किसानों का कहना है- क्षेत्र में धान की पैदावार लगातार बढ़ रही है, लेकिन अब तक यहां कोई मिल नहीं लगाई गई। मजबूरी में वे 2 से 3 हजार रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से धान कोटा संभाग की मंडियों में बेचने को विवश हैं। अगर जिले में चावल मिलें स्थापित हों तो न सिर्फ उन्हें बेहतर मूल्य मिलेगा, बल्कि रोजगार के भी नए अवसर सृजित होंगे। सरकार की अनदेखी से हो रहा नुकसान कोटा और बूंदी की राइस मिलों में 100 किलो धान से लगभग 65 किलो चावल और 35 किलो छिलका निकलता है। छिलके का भी बाजार में अच्छा दाम मिलता है, लेकिन इसका लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाता। किसान कहते हैं कि सरकारें अब तक उनकी इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान नहीं दे पाई हैं, जिसके कारण फसल का वाजिब मूल्य उन्हें नहीं मिल रहा।


