फसल की सलाह:पहले बीज को बुवाई के लायक बनाएं, बिना उपचार किया बीज रोग बढ़ाता है

यदि आप खेतों में बुवाई शुरू कर रहे हैं तो पहले देख लें कि आपका बीज अंकुरित होने लायक है या नहीं। बीज सही नहीं है तो उसका उपचार करना जरूरी है। गेहूं के बीज का उपचार नहीं होने पर रोग बढ़ सकते हैं और उत्पादन में 10 से 40% तक नुकसान हो सकता है। सरसों में फफूंदनाशी रसायन व जैविक तरीके से बीज उपचार करने से रोग काबू में रहते हैं, उत्पादन 30 से 50% तक बढ़ सकता है। चने में बीज का उपचार कर 20-35% तक अधिक उपज ले सकते हैं। बीकानेर-जैसलमेर में बीजोपचार कर चना उत्पादन 20% तक बढ़ाया गया है। अलवर, भरतपुर , धौलपुर में सरसों का अच्छा उत्पादन भी इसी का नतीजा है। दो विधियों से कर सकते हैं बीजोपचार जैविक उपचार : एक किलो बीज में ट्राइकोडर्मा या सूडोमोनास फ्लोरेसेंस 10 ग्राम (पाउडर) लेकर बीज को पहले हल्का गीला करें, फिर इन जैविक फफूंदनाशकों से अच्छी तरह मिलाएं। इसके बाद बीज छाया में सुखाएं। उपचार के बाद कम से कम 24 घंटे बाद बुवाई करनी चाहिए। रासायनिक उपचार फसलों के अनुसार अलग-अलग फफूंदनाशी लेना हैं। जैसे-गेहूं व जौ में अनावृत्त कंडवा व पत्ती कंडवा रोग के लिए एक किलो बीज में 2 ग्राम कार्बोक्सिन अथवा कार्बेन्डाजिम 50% WP उपयोग करें। चने में जड़ गलन, सूखा जड़ गलन, उखटा रोग के लिए एक किलो बीज में 3 ग्राम थाइरम व कार्बेन्डाजिम (2:1) लें। सब्जियों की बुवाई से पहले डंपिंग ऑफ जैसे रोगों के लिए एक किलो बीज में 6 ग्राम मेटालेक्सिल का इस्तेमाल करें। चना- जैसलमेर और बीकानेर जिलों में कृषि विज्ञान केंद्र की ट्रायल। क्या किया: कार्बेन्डाजिम और राइजोबियम कल्चर से उपचार के साथ संतुलित खाद दी। नतीजा- उपचारित बीज में अंकुरण दर 10–12% ज्यादा रही। उत्पादन 15–20% तक बढ़ा। (रासा यनिक+ जैविक (राइज बियम) दोनों तरह के बीज उपचार से दालों में उपज और नाइट्रोजन स्थिरीकरण बढ़ता है।)जिलों में सरसों का अच्छा उत्पादन होता है। सरसों – अलवर, भरतपुर और धौलपुर जिले में जो किसान जैविक तेल की फसलों (इसमें प्रमुख रूप से सरसों) का उत्पादन कर रहे हैं, वे बीज का उपचार ट्राइकोडर्मा (पाउडर) से कर रहे हैं। इनसे यह देखने में आया कि फसलों में रोग कम हुए और उत्पादन बढ़ा है। ये हैं वे पारंपरिक तरीके, जिन्हें अपनाकर किसान अपने स्तर पर बीजोपचार करते हैं किसान अपने स्तर पर अलग-अलग पारंपरिक तरीके अपनाते हैं। इनके भी अच्छे परिणाम देखे गए हैं। तेज गर्मी: गेहूं-जौ के बीज तेज धूप में 4-6 घंटे रखने से सुशुप्त अवस्था के कारक नष्ट हो जाते हैं।
नीम (पत्तियों का घोल या पाउडर): नीम में एजाडिरैक्टिन होता है, जो फफूंद, कीट व वायरस को रोकने में मदद करता है। हल्दी- कर्क्यूमिन एंटी-फंगल और एंटी-बैक्टीरियल गुण ।
गोमूत्र- सूक्ष्म पोषक तत्व, लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया व रोगनाशक तत्व होते हैं।

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