किसान भाइयों ने कहावत तो सुनी ही होगी ‘जैसा बोओगे वैसा काटोगे’ या ‘सुघड़ बीज, सुघड़ खेती’। महाकवि घाघ ने भी कहा था कि खेती की सफलता का मूल मंत्र है गुणवत्ता युक्त बीज। आज भी यह बात उतनी ही प्रासंगिक है। शुद्ध और स्वस्थ प्रमाणित बीज न केवल फसल की नींव मजबूत बनाते हैं, बल्कि कीट और रोगों की संभावना भी घटाते हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तम बीज साधारण बीज की तुलना में 20 से 30% तक अधिक उत्पादन देता है। वहीं घटिया बीज से उपज कम होती है, खरपतवार ज्यादा उगता है और बाजार में फसल का भाव भी घट जाता है।यदि किसान देर से बुवाई करना चाह रहा है, तो वह ऐसी किस्म चुनें जो ठंड या कम तापमान में भी अंकुरण दे सके। वहीं जल्दी बोआई करने वाले किसान को ऐसी किस्म चुननी चाहिए जो जल्दी बढ़े और रोगों से बचाव करे।HI-1634 गेहूं की किस्म ठंडी परिस्थितियों में भी बेहतर प्रदर्शन देती है, आप यदि देरी से फसल बो रहे हैं तो ये वेरायटी बेहतर होगी, जबकि HI-1653 समय पर बोआई के लिए उपयुक्त है। चने में JG-226 किस्म को कम पानी और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए राज्य और केंद्र स्तर पर मान्यता मिली है। इसकी बीज दर 30 किलो/एकड़ होती है, जबकि उत्पादन 20–22 क्विंटल/ हेक्टेयर तक चला जाता है। सरसों की नई प्रजातियां भी देंगी बढ़िया पैदावार सरसों की उन्नत किस्में-PPJ-15, PPJ-14, BPM-11, राजविजय तोरिया-1, PM-30, पूसा सरसों-27 और पूसा सरसों-30-रोग प्रतिरोधी हैं और किसानों को स्थिर उपज देती हैं। कई किसान यह मानते हैं कि ज्यादा बीज बोने से उपज बढ़ जाएगी, जबकि यह गलत है। ज्यादा बीज डालने से पौधों को हवा, पानी और पोषक तत्व नहीं मिलते और वे कमजोर रह जाते हैं। इससे उत्पादन घटता है। इसलिए हर फसल के लिए अनुशंसित बीज दर ही अपनाएं। ये आपको राज्य बीज निगम, राष्ट्रीय बीज निगम, मध्यभारत कंसोर्टियम, बीज सहकारी समितियों एवं निजी संस्थाओं से प्राप्त किये जा सकते हैं। प्रमाणित बीज क्यों जरूरी है बीज खेती का मूल आधार है। अगर बीज शुद्ध नहीं होगा, तो मिट्टी की उर्वरता और खाद-पानी का पूरा उपयोग नहीं हो पाएगा। प्रमाणित बीजों में अंकुरण दर अधिक होती है और रोगजनक तत्व नियंत्रित रहते हैं। अशुद्ध बीजों से न केवल उपज घटती है, बल्कि कीट और फफूंद का प्रकोप भी बढ़ जाता है। प्रमाणित बीज के पैकेट पर बीज प्रमाणीकरण संस्था का नीला टैग होना चाहिए।


