हर कर्म सोच-समझकर करना चाहिए, भाव ही कर्मों की नींव होते हैं

भास्कर न्यूज | लुधियाना सुंदर नगर स्थित जैन स्थानक में आयोजित धर्मसभा में संत जितेंद्र मुनि महाराज ने कहा कि जीवन की सच्ची सफलता बाहरी दिखावे, धन और भौतिकता में नहीं बल्कि भावों की शुद्धता और नैतिक आचरण में छिपी है। उन्होंने बताया कि मनुष्य का उत्थान उसकी आंतरिक भावनाओं और कर्मों से तय होता है। मुनि महाराज ने मनुष्य की दृष्टि को तीन श्रेणियों में बताते हुए कहा कि पहली श्रेणी के लोग केवल वस्तुओं को देखते हैं, दूसरी श्रेणी के लोग दूसरों के व्यवहार पर ध्यान देते हैं, जबकि उत्तम श्रेणी के लोग दूसरों के मन के भाव और नीयत को समझते हैं। उन्होंने कहा कि हमें अपनी दृष्टि को निरंतर उत्तम श्रेणी की ओर ले जाना चाहिए। सकारात्मक भावनाएं पाप कर्मों को कमजोर करती हैं और व्यक्ति को श्रेष्ठ जीवन की ओर ले जाती हैं। अच्छे कुल में जन्म लेना काफी नहीं है, बल्कि समय का सही उपयोग ही जीवन को सफल बनाता है। उन्होंने उदाहरण दिया कि जहां कुछ लोग तीन घंटे व्यर्थ कर देते हैं, वहीं वही समय यदि शुभ कार्य में लगाया जाए तो जीवन में बड़ा बदलाव आता है। मुनि महाराज ने कहा कि निरंतर सदाचार और नैतिक जीवन का अभ्यास व्यक्ति को साधु बनने की योग्यता प्रदान करता है। यह किसी चमत्कार का नहीं बल्कि निरंतर प्रयास का परिणाम है। हर कर्म सोच-समझकर करना चाहिए क्योंकि भाव ही कर्मों की नींव होते हैं। समापन में उन्होंने संगत से आह्वान किया कि वे अपनी आंतरिक भावनाओं को उत्तम बनाएं और हर कार्य में शुद्ध नीयत रखें।

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