हाई कोर्ट ने दुर्ग फैमिली कोर्ट के फैसले को पलटते हुए एक पत्नी पर क्रूरता के आरोपों को सही माना है। जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस एके प्रसाद की डिवीजन बेंच ने पति की अपील मंजूर की और पत्नी को एकमुश्त 25 लाख रुपए गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया है। हाई कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्ष 2014 से अलग रह रहे हैं, रिश्ता पूरी तरह टूट चुका है और अब इसे बचाने की कोई गुंजाइश नहीं बची। पत्नी की ओर से बार-बार झूठे आरोप लगाना, गर्भपात कराना और बच्चे के साथ दुर्व्यवहार जैसी घटनाएं क्रूरता की श्रेणी में आती हैं। दुर्ग निवासी दंपती की शादी 4 मार्च 2009 को भिलाई के साईं मंगलम भवन में हुई थी। दोनों का एक बेटा भी है। दोनों में शादी के बाद से ही विवाद शुरू हो गए। पत्नी ने आरोप लगाया कि ससुराल वाले उसे मामूली मुद्दों पर तंग करते थे, हनीमून से लौटने के बाद परीक्षा के बहाने मायके भेज दिया गया, गर्भावस्था में चिकित्सा सुविधा नहीं दी गई जिससे दो बार गर्भपात हुआ। बच्चे के जन्म पर खर्च नहीं उठाया और 2014 में पुलिस की मदद से ससुराल से निकाली गई। उसने दुर्ग फैमिली कोर्ट में 9 सितंबर 2014 को दांपत्य अधिकार की बहाली की मांग करते हुए याचिका लगाई। हाई कोर्ट ने कहा- रिश्ता पूरी तरह टूट चुका
पति ने हाई कोर्ट में अपील की। हाई कोर्ट ने गवाहों के बयान, दस्तावेज और सुप्रीम कोर्ट के समर घोष बनाम जया घोष मामले का हवाला देते हुए फैसला सुनाया। ने कहा कि 10 साल से ज्यादा अलगाव, मध्यस्थता में असफलता, पत्नी का अंतिम संस्कार या ससुर की सर्जरी में न जाना जैसी घटनाएं दिखाती हैं कि रिश्ता पूरी तरह से रूप से टूट चुका है। पत्नी का बच्चे और परिवार के साथ व्यवहार मानसिक-शारीरिक क्रूरता है। हाई कोर्ट ने पति को पत्नी को एकमुश्त 25 लाख गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए हैं। पति ने कहा- खुद खाती थी गर्भपात की गोलियां
वहीं, पति ने जवाब में कहा कि पत्नी खुद गर्भपात की गोलियां खाती थीं, बिना बताए दो बार गर्भपात करा लिया। बच्चे को बेवजह पीटती और बाथरूम में बंद कर देती थी, झूठे पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराती थीं और ससुराल में चाकू-लोहे की रॉड से हमला करने की कोशिश की। हालांकि दुर्ग फैमिली कोर्ट ने पत्नी के पक्ष में फैसला दिया। 20 दिसंबर 2022 को पत्नी की याचिका मंजूर कर दांपत्य बहाली का आदेश दिया।


