भारतीय दिव्यांग क्रिकेट टीम:किसी ने एक्सीडेंट में पैर गंवाया, किसी को जन्म से पोलियो तो किसी का एक पैर ही नकली

किसी को जन्म से पोलियो है, किसी ने एक्सीडेंट में पैर गंवा दिया, किसी का जन्म से ही एक पैर और एक हाथ नहीं है, ऐसे लोग जिंदगी की जंग के साथ-साथ अब क्रिकेट की जंग भी लड़ने को तैयार हैं। श्रीलंका में दिव्यांग क्रिकेटरों के लिए चैम्पियंस ट्रॉफी का आयोजन 12 से 21 जनवरी तक है। इसमें भारत की टीम भी हिस्सा ले रही है। इन दिनों भारत की दिव्यांग टीम का कैम्प राजस्थान के पूर्ण रणजी कप्तान रोहित झालानी की देखरेख में जयपुर में चल रहा है। भास्कर ने इन खिलाड़ियों की कहानियों को जाना…। राइट हैंड डेवलप ही नहीं हुआ, परिवार का सहारा बने राधिका राधिका प्रसाद अयोध्या से हैं। इनका राइट हैंड पूरी तरह से डेवलप ही नहीं हुआ। हार नहीं मानी। तीन साल दिल्ली में पीसीओ पर काम किया। परिवार का सहारा बने और पढ़ाई करते रहे। सिविल इंजीनियरिंग की और अयोध्या में ही एक कंपनी में वैल्यूएशन इंजीनियर हैं। पैसे सिर्फ 18 हजार मिलते हैं। घर का खर्चा भी नहीं चलता। मीडियम पेसर हैं। नेशनल में स्टेट के लिए खेलते हुए दो मैन अॉफ द मैच मिले। मोटर साइकिल से एक्सीडेंट हुआ, घुटने की हड्डी टूट गई माजिद मगरे, अनंतनाग, कश्मीर से हैं। कहते हैं, पापा क्रिकेट खेलते थे तो मैं उनका किटबैग उठाकर ले जाता था। तभी से क्रिकेट में इंटरेस्ट जागा। मोटरसाइकिल से एक्सीडेंट के बाद मेरे घुटने की हड्डी टूट गई। दो साल तक मैं पूरी तरह से बिस्तर पर रहा। थोड़ा बहुत ट्रेनिंग वगैरह करके खड़ा होना शुरू किया तो क्रिकेट की तरफ रुख किया। अॉलराउंडर हूं। 2022 और 2023 में जम्मू-कश्मीर टीम नेशनल चैम्पियन बनी थी। 65 किलोमीटर यात्रा कर ट्रेनिंग के लिए जाते थे रविन्द्र रविन्द्र शांते भी मुंबई से हैं। मुंबई की सभी बड़ी लीग में खेलते हैं। दाएं हाथ का ऊपरी हिस्सा जन्म से पोलियोग्रस्त है। कहते हैं, जैसे ही दायां हाथ छोड़ता हूं, एकदम लटक जाता है। हां, बाएं हाथ से बैटिंग और बॉलिंग करता हूं। 65 किलोमीटर की यात्रा करके रोज प्रैक्टिस के लिए मुंबई जाता था। 2-3 घंटे प्रैक्टिस के बाद वापस आना रूटीन था। हां, मुंबई के बड़े-बड़े क्रिकेटर्स के साथ खेलने को मिल जाता था। एक पैर नहीं, परफॉर्मेंस से जीत ली थी कार जोधपुर के सुरेन्द्र ने सुरेन्द्र जोरवाल जोधपुर से हैं। इनका लेफ्ट लेग आर्टिफिशियल है और दाएं हाथ की उंगलियां नहीं है। बालोतरा में इकबाल सर से ट्रेनिंग लेते हैं। बचपन में लोग बोलते थे तू क्रिकेट नहीं खेल पाएगा, बस दूर से देखता रह। मैंने तभी ठान िलया था कि क्रिकेट खेलना है। उदयपुर में जो नेशनल हुआ था उसमें मैं मैन अॉफ सीरीज था तो मुझे टाटा पंच कार मिली थी। अॉलराउंड हैं, श्रीलंका से चैम्पियन बनने का सपना है। षणमुगम नाइट शिफ्ट करते और सुबह प्रैक्टिस करते षणमुगम चेन्नई से हैं। वे पेप्सी फैक्ट्री में नाइट शिफ्ट करते थे और सुबह वेणुगोपाल सर की एकेडमी में प्रैक्टिस के लिए जाते थे। इनका बायां हाथ बचपन से ही पोलियो ग्रस्त है। एक समय इनके पास बैट-बॉल तक के पैसे नहीं थे तब लोकल क्रिकेटर श्रीकांत ने सपोर्ट किया। अब रॉयल एनफील्ड कंपनी में सर्विस करते हैं। सुबह 6-2 नौकरी के बाद क्रिकेट की प्रैक्टिस करते हैं।

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