CSVTU यूनिवर्सिटी भिलाई में 9.44 लाख का PhD फीस घोटाला:छात्रों को फर्जी रसीदें दी गईं, कर्मचारी ने अपने अकाउंट में रखे पैसे,FIR के निर्देश

छत्तीसगढ़ के एकमात्र स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय (CSVTU) भिलाई के पीएचडी प्रकोष्ठ में फीस वसूली के जरिए वित्तीय घोटाला हुआ है। विश्वविद्यालय की तरफ से गठित दो सदस्यीय जांच समिति की प्रारंभिक रिपोर्ट में 9 लाख 44 हजार 500 रुपए के गबन की पुष्टि हुई है। जांच में पाया गया कि, पीएचडी शोधार्थियों से कैश और ऑनलाइन राशि लेकर फर्जी रसीदें दी गईं। विश्वविद्यालय की कार्य परिषद ने मामले में एफआईआर दर्ज कराने का निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने 1 दिसंबर 2025 को पीएचडी प्रकोष्ठ में वित्तीय अनियमितताओं की जांच के लिए समिति गठित की थी। समिति की पहली बैठक 15 दिसंबर 2025 को आयोजित हुई। जिसमें पीएचडी प्रकोष्ठ प्रभारी डॉ. एस.आर. ठाकुर उपस्थित रहे। बैठक में कुछ थीसिस सबमिशन शुल्क से संबंधित रसीदों का अवलोकन किया गया। विवि के पूर्व अफसरों की भूमिका जांच के दायरे में जांच के दौरान समिति को बताया गया कि, संबंधित अवधि में पीएचडी प्रकोष्ठ का कार्य कनिष्ठ सलाहकार सुनील कुमार प्रसाद द्वारा, तत्कालीन अकादमिक प्रभारी डॉ. दीप्ती वर्मा के निर्देशन में किया जा रहा था। समिति ने जनवरी 2024 से वर्तमान तक के सभी थीसिस सबमिशन, RDC और नोटिफिकेशन प्रकरणों से जुड़ी फीस रसीदें पेश करने के निर्देश दिए। इस बीच कुलपति के आदेश पर मुख्य वित्त अधिकारी से कुछ विशिष्ट कैश रसीदों को लेकर जानकारी मांगी गई थी। मुख्य वित्त अधिकारी की तरफ से उपलब्ध कराई गई जानकारी की भी जांच समिति ने अध्ययन किया। 52 प्रकरणों की जांच, 30 में अनियमितता शोधार्थी बोले- सलाहकार के कहने पर किया भुगतान 30 दिसंबर 2025 को जांच समिति की बैठक में पीएचडी शोधार्थियों को अभिकथन के लिए बुलाया गया। 7 शोधार्थी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए, जबकि कुछ ने ईमेल के माध्यम से अपने बयान भेजे। सभी शोधार्थियों ने समिति के सामने स्वीकार किया कि उन्होंने फीस कनिष्ठ सलाहकार सुनील कुमार प्रसाद के कहने पर जमा किया। भुगतान नकद रूप में या फिर सुनील कुमार प्रसाद या उनके परिचितों (रमेश/शिव पाल) के बैंक खातों में ऑनलाइन किया गया। शोधार्थियों ने ऑनलाइन भुगतान की पावती भी समिति को सौंपी है। कनिष्ठ सलाहकार ने राशि लेने की बात स्वीकारी जांच समिति के समक्ष उपस्थित होकर सुनील कुमार प्रसाद ने अपने बयान में स्वीकार किया कि उन्होंने शोधार्थियों से कैश और ऑनलाइन राशि प्राप्त की है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि, नस्तियों में पाई गई सभी रसीदें उन्होंने ही शोधार्थियों को दी थीं। सुनील कुमार प्रसाद ने यह दावा भी किया कि, उन्होंने यह कार्य तत्कालीन प्रभारी कुलसचिव अंकित अरोरा के निर्देश पर किया। शोधार्थियों से प्राप्त राशि उन्हें सौंप दी जाती थी। इसके बदले उन्हें उसी दिन या अगले दिन रसीदें उपलब्ध कराई जाती थीं। हालांकि, इस संबंध में कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं किया गया। तत्कालीन कुलसचिव ने आरोपों से किया इनकार तत्कालीन प्रभारी कुलसचिव अंकित अरोरा ने जांच समिति के सामने प्रस्तुत अपने अभिकथन में सभी आरोपों का खंडन किया। उन्होंने कहा कि, न तो उन्होंने कोई राशि ली और न ही कोई रसीद जारी की। उन्होंने समिति को स्वतंत्र जांच के लिए हैंडराइटिंग एक्सपर्ट और साइबर जांच कराने की अनुमति देने की बात कही। वहीं, तत्कालीन पीएचडी अकादमिक प्रभारी डॉ. दीप्ती वर्मा ने फर्जी रसीदों के संबंध में जानकारी न होना बताया। उन्होंने कहा कि वो केवल अकादमिक और नियमों के अनुसार फाइलों का परीक्षण कर आगे बढ़ाते थे और उन्हें कभी रसीदों की सत्यता पर संदेह नहीं हुआ। कार्य परिषद का निर्णय, FIR दर्ज होगी जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर विश्वविद्यालय की कार्य परिषद की बैठक 22 जनवरी 2026 को आयोजित हुई। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि कनिष्ठ सलाहकार सुनील कुमार प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी। साथ ही इस पूरे प्रकरण में किसी अन्य अधिकारी, कर्मचारी या सलाहकार की संलिप्तता की भी जांच कराए जाने का निर्णय लिया गया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले को लेकर नेवई थाने में आवेदन देकर संबंधित धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

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