MP में नहीं बनेंगे फर्जी डिसेबल सर्टिफिकेट, जांच होगी सटीक:संशोधित गाइडलाइन पर काम शुरू, 10 जिले से पहुंचे अफसर, रिकॉर्ड होंगे पूरी तरह डिजिटल

मध्यप्रदेश में अब फर्जी डिसेबल सर्टिफिकेट नहीं बनेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि दिव्यांगजनों के प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया अब और अधिक वैज्ञानिक, पारदर्शी और एकीकृत होने जा रही है। एम्स भोपाल और लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग ने मिलकर पहली बार रिवाइज्ड डिसएबिलिटी असेसमेंट गाइडलाइंस पर राज्यस्तरीय वर्कशॉप आयोजित की। इसमें प्रदेश के सभी सात संभागों से मेडिकल बोर्ड के प्रतिनिधि, सिविल सर्जन और विशेषज्ञ डॉक्टर शामिल हुए। वर्कशॉप में विशेषज्ञों ने केस आधारित प्रशिक्षण देकर बताया कि गलत मूल्यांकन किस तरह मरीजों के अधिकारों को प्रभावित करता है और वैज्ञानिक मूल्यांकन कैसे राहत दे सकता है। पूरे राज्य में जल्द डिजिटल रिकॉर्ड कीपिंग और पंचायत स्तर पर स्क्रीनिंग कैंप शुरू करने की दिशा तय की गई। एम्स के कार्यपालक निदेशक प्रो. (डॉ.) माधवानंद कर के नेतृत्व में यह प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार किया गया। जिसमें लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग की वरिष्ठ संयुक्त निदेशक डॉ. प्रज्ञा तिवारी, हाईकोर्ट की जुवेनाइल जस्टिस कमेटी के वरिष्ठ सलाहकार गुरमुख सिंह लांबा, आनंद सेवा सोसाइटी के संस्थापक ज्ञानेंद्र पुरोहित, एम्स के डीन डॉ. रजनीश जोशी समेत अन्य मौजूद रहे। 45 अधिकारी और डॉक्टरों ने लिया प्रशिक्षण
वर्कशॉप में मध्यप्रदेश के सभी सात संभागीय मेडिकल बोर्डों के चेयरपर्सन, आरडी ऑफिस से मास्टर ट्रेनर और 10 जिलों (भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, रीवा, उज्जैन, सागर, छिंदवाड़ा, धार और सीहोर) से आए सिविल सर्जन शामिल हुए। इसके साथ ही ऑर्थोपेडिक्स, नेत्र रोग और ईएनटी विशेषज्ञ भी तकनीकी सत्रों में शामिल रहे। यह पहली बार था जब राज्यभर के मेडिकल बोर्ड एक ही मंच पर आकर प्रमाणन की हर चरण प्रक्रिया पर प्रशिक्षण ले रहे थे। इन महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा • लोकमोटर डिसएबिलिटी • मानसिक रोग • बौद्धिक अक्षम्यता व क्रॉनिक न्यूरोलॉजिकल कंडीशन • विशेष शिक्षण अक्षमता/ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर • श्रवण बाधितता • दृष्टि बाधितता • रक्त विकार • बहु विकलांगता कमिश्नर राठौर ने दिए यह निर्देश
राज्य के चिकित्सा शिक्षा विभाग के आयुक्त तरुण राठौर ने स्पष्ट कहा कि अब कोई भी योग्य बच्चा या व्यक्ति दिव्यांगता प्रमाण पत्र से वंचित नहीं रहे। उन्होंने तीन बड़े सुधार पॉइंट सुझाए। पहला यह कि सभी रिकॉर्ड पूरी तरह डिजिटल हों और एकीकृत प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध रहें। दूसरा, पंचायत स्तर पर स्क्रीनिंग सिस्टम विकसित किया जाए। अंत में उन्होंने कहा कि क्लस्टर–पंचायत स्तर पर नियमित शिविर आयोजित हों। जिन मामलों में विस्तृत मूल्यांकन जरूरी हो, उन्हें ब्लॉक स्तरीय मेडिकल बोर्ड को संदर्भित करने की भी सलाह दी गई। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश लागू करने की जरूरत
वरिष्ठ सलाहकार गुरमुख सिंह लांबा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने निर्देशित किया है कि दिव्यांग बच्चों के लिए स्क्रीनिंग कैंप नियमित होने चाहिए, ताकि उन्हें समय पर प्रमाण पत्र मिल सके। उन्होंने एम्स और स्वास्थ्य विभाग की इस संयुक्त पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह कदम सीधे उन परिवारों की जिंदगी आसान करेगा, जिनके बच्चे प्रमाणन में देरी के कारण सरकारी योजनाओं से वंचित रहते हैं।

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