ग्वालियर हाईकोर्ट की युगल पीठ ने नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) के डिप्लोमा पाठ्यक्रम से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल प्रक्रियात्मक या तकनीकी त्रुटि के आधार पर किसी अभ्यर्थी की उम्मीदवारी रद्द नहीं की जा सकती। सेल्फ-एप्रेजल फॉर्म अपलोड न होने को अयोग्यता मानते हुए प्रवेश या परिणाम रोकना न्यायसंगत नहीं है। यह आदेश डॉ. शैलेंद्र गिरी गोस्वामी बनाम मध्यप्रदेश शासन एवं अन्य मामले में पारित किया गया। याचिकाकर्ता ने अप्रैल 2024 में NBEMS द्वारा जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें जिला अस्पताल सागर में नेत्र रोग (ऑप्थैल्मोलॉजी) विषय के NBEMS डिप्लोमा कोर्स की उनकी ट्रेनिंग निरस्त कर दी गई थी। NBEMS ने सेल्फ-एप्रेजल फॉर्म समय पर अपलोड न होने को आधार बनाकर यह कार्रवाई की थी। तकनीकी गड़बड़ी के कारण अपलोड नहीं हुआ फॉर्म सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता ने समय रहते सेल्फ-एप्रेजल फॉर्म भरने का प्रयास किया था, लेकिन तकनीकी गड़बड़ी के कारण वह पोर्टल पर अपलोड नहीं हो सका। कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता शैक्षणिक रूप से पूरी तरह पात्र था और उसकी ओर से किसी प्रकार की जानबूझकर की गई लापरवाही नहीं थी। इससे पहले हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए याचिकाकर्ता को कोर्स जारी रखने और परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी थी, साथ ही परीक्षा परिणाम को सीलबंद लिफाफे में रखने के निर्देश दिए थे। अंतिम आदेश में कोर्ट ने कहा कि मात्र तकनीकी या प्रक्रियात्मक त्रुटि के आधार पर प्रवेश निरस्त करना या परिणाम रोकना न्याय के उद्देश्य के विपरीत है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने NBEMS को निर्देश दिए कि वह पोर्टल खोलकर याचिकाकर्ता का सीलबंद रखा गया परिणाम घोषित करे।


