न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया (NSI) के NSICON-2025 के चौथे दिन 200 से अधिक शोध पत्रों पर चर्चा हुई। इस साल की थीम है “ब्रेन और स्पाइन देखभाल में चुनौतियों पर विजय”। इसी को ध्यान में रखते हुए प्रमुख अतिथि के रूप में जनरल वी.पी. मलिक को आमंत्रित किया गया था। जनरल मलिक ने सैनिकों के साहस और जीतने के जज्बे के बारे में बताते हुए कहा कि कारगिल युद्ध में जवानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। सीमित संसाधनों के बावजूद उनका जूनून और जीतने का जज्बा ही उन्हें मैदान में विजयी बनाता है। इसी जज्बे से ऑपरेशन विजय में सफलता मिली। उन्होंने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान हजारों घायल सैनिकों को भर्ती किया गया था, जिनमें केवल 10–15 की मृत्यु हुई। यह आंकड़ा सैन्य चिकित्सा की दक्षता और समर्पण का परिचायक है। ऑपरेशन सिंदूर में भी सैनिकों ने इसी जज्बे के साथ लड़ाई लड़ी, लेकिन इस बार टेक्नोलॉजी के अधिक इस्तेमाल से विजय मिली। उन्होंने कहा कि समय के साथ जीवन में नई तकनीकों को अपनाना आवश्यक है। वैज्ञानिक सत्र और न्यूरोसर्जरी में नवीन शोध शनिवार को वैज्ञानिक सत्रों में स्कल बेस सर्जरी से जुड़े नवीन शोध प्रस्तुत किए गए। विशेषज्ञों ने बताया कि कम चीरे वाली सर्जरी और तेज़ रिकवरी अब आधुनिक न्यूरोसर्जरी की पहचान हैं। भारतीय सशस्त्र बलों के न्यूरोसर्जनों ने युद्धकालीन परिस्थितियों में ब्रेन इंजरी और ट्रॉमा मैनेजमेंट पर अपने अनुभव साझा किए, जो सैन्य और नागरिक चिकित्सा के बढ़ते सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ऑर्गनाइजिंग चेयरमैन डॉ. वसंत डाकवाले ने कहा कि आज के स्पेशल वक्ता जनरल वी.पी. मलिक ने सभी डॉक्टरों को प्रोत्साहित किया। डॉक्टरों को सैनिक की तरह ही जीतने का जज्बा रखना चाहिए, चुनौतियों से हार नहीं माननी चाहिए और समय के साथ तकनीक को अपनाना चाहिए। न्यूरोसर्जरी अब केवल तकनीक नहीं बल्कि विज्ञान, अनुभव और संवेदना का संतुलित समन्वय है। मरीज की गरिमा और जीवन की गुणवत्ता हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। अमेरिका से आए विश्वप्रसिद्ध न्यूरोसर्जन डॉ. केनन आर्टानोविक ने जैकब चांडी ऑरशन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि मस्तिष्क से जुड़ी गंभीर बीमारियों में सर्जरी ही सबसे प्रभावी उपाय है, इसलिए इलाज में देरी नहीं करनी चाहिए। दोपहर के “वेलनेस इन न्यूरोसर्जरी” सत्र में डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य और रचनात्मकता पर ध्यान केंद्रित किया गया। लाइव म्यूजिकल वर्कशॉप के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि दूसरों की जान बचाने वाले डॉक्टरों की खुद की सेहत भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। डॉ. जे.एस. कठपाल ने पोस्ट-सर्जरी देखभाल पर चेतावनी दी कि मरीज अक्सर डॉक्टर की सलाह को हल्के में लेते हैं, जिससे गंभीर संक्रमण, पुनः रक्तस्राव और जटिलताएँ हो सकती हैं। आज हुआ कार्यक्रम का समापन रविवार को हुए समापन सत्र में प्रशिक्षण कार्यक्रमों में बदलाव की आवश्यकता पर चर्चा हुई। वरिष्ठ न्यूरोसर्जनों ने सुझाव दिया कि वर्तमान तीन वर्षीय प्रशिक्षण को पुनर्गठित कर अधिक व्यावहारिक और समान बनाया जाए। विभिन्न प्रशिक्षण केंद्रों में अनिवार्य रोटेशन प्रणाली लागू की जानी चाहिए, ताकि सभी प्रशिक्षुओं को समान अनुभव मिले। ब्रेन सुरक्षा के लिए जागरूकता रविवार सुबह “न्यूरोथॉन – रन फॉर ब्रेन, वियर हेलमेट” कार्यक्रम हुआ। इसमें न्यूरोलॉजिस्ट, न्यूरोसर्जन और प्रतिभागियों ने सड़क सुरक्षा, हेलमेट उपयोग और मस्तिष्क की सुरक्षा के लिए जागरूकता की शपथ ली। ऑर्गनाइजिंग चेयरमैन डॉ. वसंत डाकवाले ने बताया कि इस जन-जागरूकता रन और वीडियो अपील के माध्यम से आम नागरिकों तक “Save Brain” का संदेश पहुचाया जा रहा है। इसका उद्देश्य सिर की चोटों से होने वाली असमय मौतें और विकलांगता कम करना है। उन्होंने कहा कि जिस तरह इंदौर स्वच्छता में नंबर वन है, उसी तरह ट्रैफिक नियमों का पालन करके अपने शहर को सड़क सुरक्षा में भी नंबर वन बनाना चाहिए। सभी को हेलमेट पहनना चाहिए और नियमों का पालन करना चाहिए।


