अंधेरे के खिलाफ युद्ध; 45 साल में 7 हजार+ दृष्टिबाधित बच्चों को मिली निशुल्क शिक्षा, 32 साल में 3 लाख से अधिक जरूरतमंदों का सहारा…

^इस सेवा प्रकल्प की प्रेरणा मुझे वर्ष 1963 में अमृतसर के श्री दुर्ग्याना मंदिर स्थित अंधविद्यालय को देखकर मिली थी। उस समय दृष्टिबाधित बच्चों की स्थिति देखकर उनके मन में इन्हें शिक्षित करने का विचार अंकुरित हुआ। ​अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद मैं श्रीगंगानगर आया और 1980 में जगदंबा अंधविद्यालय की नींव रखी। प्रारंभ में विद्यालय में कक्षा 1 से 5वीं तक की पढ़ाई शुरू की गई। संघर्ष के उन दिनों में विद्यालय में केवल एक शिक्षक और एक ही विद्यार्थी था। धीरे-धीरे सुविधाओं में विस्तार हुआ और स्कूल को 10वीं कक्षा तक क्रमोन्नत किया गया। वर्ष 1986 से 1987 के बीच इस विद्यालय ने अभूतपूर्व प्रगति की। राजस्थान, पंजाब और हरियाणा से आने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़कर 500 से अधिक हो गई। बच्चों की इतनी बड़ी संख्या को देखते हुए परिसर में तीन छात्रावास बनाए गए ताकि दूर-दराज के बच्चों को रहने में असुविधा न हो। समय के साथ श्रीगंगानगर के पड़ोसी राज्यों में भी दृष्टिबाधित बच्चों के लिए विद्यालय खुल गए। ऐसे में दूर-दराज से आने वाले बच्चों को उनके घर के पास स्थित स्कूलों में स्थानांतरित कर दिया गया ताकि वे अपने परिवार के करीब रह सकें। वर्तमान में इस विद्यालय में 70 बच्चे पूरी निष्ठा के साथ शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इस बीच यहां 29 सितंबर 1993 में पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने श्री जगदंबा चेरिटेबल आई हॉस्पिटल का उद्घाटन किया। – जैसा कि अंधविद्यालय के संस्थापक स्वामी ब्रह्मदेव महाराज ने बताया. भास्कर संवाददाता |श्रीगंगानगर अंधेरे के खिलाफ शुरू हुआ यह महायुद्ध आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। जहां एक ओर बच्चों को ब्रेल लिपि के माध्यम से ज्ञान के उजाले से जोड़ा जा रहा है। वहीं, दूसरी ओर फ्री आई कैम्प के जरिए बुजुर्गों और जरूरतमंदों की आंखों की रोशनी बचाई जा रही है। हम बात कर रहे हैं हनुमानगढ़ रोड स्थित श्री जगदंबा अंधविद्यालय की। मानवता की इस बेमिसाल सेवा को अब भारत सरकार ने देश के प्रतिष्ठित “पद्मश्री’ सम्मान से नवाजने का निर्णय लिया है। पिछले 45 वर्षों में इन बच्चों को न केवल निशुल्क शिक्षा दी गई, बल्कि उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाया गया। इसके अलावा 32 वर्षों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के 3 लाख से अधिक लोगों के सफेद मोतियाबिंद के फ्री ऑपरेशन कर उन्हें नई दृष्टि प्रदान की गई। बता दें कि 13 दिसंबर 1980 को स्थापित इस विद्यालय ने शिक्षा के स्तर को विश्वस्तरीय बनाने के लिए स्वीडन से 20 लाख रुपए की लागत वाला ब्रेल लिपि सिस्टम मंगवाया था, जो उस समय देश में अपनी तरह का पहला प्रयास था। पद्मश्री पुरस्कार भारत गणराज्य का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है। यह पुरस्कार भारत सरकार की ओर से कला, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान और इंजीनियरिंग, जनसंपर्क, व्यापार और उद्योग, चिकित्सा, समाज सेवा, खेल और सिविल सेवा सहित विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों को प्रदान किया जाता है। 1 साल में 120 से ज्यादा यह पुरस्कार नहीं दिए जा सकते हैं। अब तक श्रीगंगानगर को दो पद्मश्री मिल चुके हैं, यह तीसरा सम्मान का मौका है। इससे पहले प्रथम एवरेस्ट विजेता कर्नल औतार सिंह चीमा व शिक्षाविद् श्याम सुंदर माहेश्वरी को यह सम्मान मिल चुका है। स्वामी ब्रह्मदेव

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