दशहरे पर रावण के पुतलों के रूप में अहंकार जलाने की देशभर में परंपरा है। इस साल दशहरा दो अक्टूबर को है। दशहरा कमेटियों की तरफ से होने वाले आयोजनों का शेड्यूल बता दिया गया है। वहीं कारीगर भी रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले तैयार करने में जुटे हैं। शहर में आदर्श नगर, बीएड कॉलेज ग्राउंड, बर्ल्ट्न पार्क और कैंट आदि जगहों पर दशहरा मनाया जाता है। जालंधर में रावण के पुतले बनाने वाले ज्यादातर कारीगर कुश्ती के पहलवान भी हैं। जालंधर में 15 परिवार हैं, जो पुतले बनाते हैं। दशहरे से पहले महीना भर बांस को रावण-मेघनाद-कुंभकरण का आकार देते हैं। रविवार को वर्कशॉप चौक के पास कारीगर राकेश सिंह पुतले बनाने में व्यस्त दिखे। उन्होंने पहले 25 से 30 फीट लंबे बांस को लंबाई से काटा, फिर छीलकर उसे प्लेन किया। छोटे टुकड़ों से रावण का बाजू, गला और धड़ के हिस्से बनाए। सबसे निचले हिस्से के लिए मोटे बांस के गोलाकार छल्ले बनाए। कुछ सजावटी चक्रियां भी बनाईं, जिनके साथ पटाखे बांधे जाते हैं। रोशनी के लिए कुछ अलग सजावटी हिस्से भी बनाए। कहते हैं, ‘एक पुतला बनाने में 25 से 30 फीट लंबे 100 बांस की खपत होती है। हम दशहरे तक यही पुतले बनाएंगे।अगर कारीगरों की पूरी टीम जुटे तो एक पुतला एक से डेढ़ दिन में बनकर तैयार हो जाता है। लोग 50 से लेकर 75 फीट ऊंचाई तक के पुतले बनवाते हैं।’ वहीं कई कारीगर रंग-बिरंगे कपड़े बांधकर पुतलों के िहस्सों की फिनिशिंग कर रहे थे। दूसरी तरफ युवा कारीगर रिकी कुश्ती से जुड़े हैं। शारीरिक डीलडौल खेल का प्रभाव महसूस कराती है। जेल चौक के पास पुराने कारीगरों में लाल पहलवान शामिल हैं। उन्हें अदब से दूसरे कारीगर ‘उस्ताद जी’ कहते हैं। साल में दशहरा, दीपावली, होली व बाकी त्योहारों से जुड़ा सामान बेचकर परिवार चलाते हैं। उधर, दशहरे के आयोजनों से तीन दशकों से जुड़े इंजी. राजकुमार चौधरी कहते हैं, ‘नई पीढ़ी को प्रभु श्रीराम की शिक्षाओं का स्पर्श देने के लिए दशहरे का आयोजन शुरू हुआ था। अहम का आकार बढ़ा दिखता है, लेकिन सच्चाई उसे पराजित कर ही देती है। इसलिए नैतिकता ही सबसे बड़ी है। अहंकार जलकर अंत में जमीन पर ही आता है।’


