रीवा में एक ही परिवार के चार बच्चे कॉपर डिस्टोनिया नाम की अजीब बीमारी से जूझ रहे हैं। इसमें उनकी मांसपेशियां दिन-ब-दिन सिकुड़ती जा रही हैं। शरीर हड्डियों का ढांचा दिखने लगा है। जिन बच्चों को दौड़ना, खेलना और स्कूल जाना चाहिए, बीमारी ने उन्हें पंगु बनाकर घर में बिठा दिया है। यह दर्द भरी कहानी है रीवा के बांसगांव के रहने वाले महेश साकेत और उसके परिवार की। बताया गया कि बीमारी का इलाज दिल्ली एम्स में ही संभव है। मांसपेशियों में ऐंठन हो जाती है, जिसकी वजह से शरीर में असहनीय दर्द होता है। कई बार तो रात में भी बच्चे दर्द की वजह से जोर-जोर से चिल्लाने लगते हैं। महेश साकेत के 7 बच्चे हैं, जिनमें से एक बेटा और 6 बेटियां हैं। चार बच्चे 6 साल की उम्र तक तो सही रहे, लेकिन जैसे ही उन्होंने इस उम्र को पार किया तो वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गए और स्कूल भी नहीं जा पाए। बच्चों के लगातार बीमारी की चपेट में आने से पूरा परिवार कर्ज में डूब गया है। भास्कर ने परिवार से बात की तो उनका दर्द छलक पड़ा। मां सुशीला (कुसुम कली) और पिता महेश कॉपर डिस्टोनिया से पीड़ित 4 बच्चों का कैसे लालन-पालन कर रहे हैं, उनकी जुबानी पूरी कहानी… 7 में से 4 बच्चे कॉपर डिस्टोनिया से पीड़ित 6 साल का होने के बाद बीमारी घेर लेती है
महेश साकेत की कुल सात संतानें हैं, इसमें से 6 बेटी और एक बेटा है। अभी तक 4 बच्चे कॉपर डिस्टोनिया नाम की बीमारी से ग्रसित पाए गए हैं। बाकी तीन बच्चों की उम्र अभी 6 साल से कम है, इसलिए अभी तक वह वह स्वस्थ हैं। माता-पिता भी उनके 6 साल की उम्र पार करने का इंतजार कर रहे हैं और भगवान से दुआ कर रहे हैं यह बीमारी उनको न पकड़ पाए। महेश साकेत का कहना है कि हर बच्चा 6 वर्ष की उम्र तक बिल्कुल सामान्य रहता है। इसके बाद वह चलने-फिरने और बोलने में भी असमर्थ हो जाते हैं। बच्चा कक्षा चार के बाद उस शारीरिक स्थिति में नहीं रहता कि स्कूल जा सके। ऐसे में दो बच्चों का स्कूल जाना छूट गया है। जबकि दो और बच्चे भी बीमारी की वजह से अब महीने में केवल दो बार ही स्कूल जा पा रहे हैं। उधर बच्चों में अजीब बीमारी की वजह से परिवार पूरी तरह से कर्ज में डूब गया है। पीड़ित महेश साकेत का कहना है कि एक संतान इस बीमारी का शिकार होती गई। दो बच्चे पूरी तरह से कॉपर डिस्टोनिया बीमारी से ग्रसित हैं, जबकि दो अन्य बच्चों में भी 6 वर्ष की उम्र के बाद लक्षण पूरी तरह से उतरने लगे हैं। बच्चे लगातार बीमारी से ग्रसित हो रहे हैं। इसी डर की वजह से घर में सात बच्चे हो गए हैं। मजदूरी से चलता है घर, नहीं करवा पाते इलाज
महेश साकेत का कहना है कि कभी-कभी काम भी नहीं मिलता है। घर में 200 रुपए की मजदूरी आती है तो किसी तरह राशन आ पाता है। एक वक्त का खाना भी बड़ा मुश्किल से बन पाता है। झोपड़ीनुमा घर में बारिश का पानी टपकता है तो ठंड में बड़ी मुश्किल से समय कटता है। ऐसे में इस बड़ी बीमारी का इलाज कैसे करवाया जाए, कुछ समझ नहीं आता है। एक बच्चा बीमार हो तो चलो किसी तरह कर्ज लेकर इलाज करवा दें। जब चार-चार बच्चों की यही हालत हो तो गरीब आदमी कहां से पैसे लाए। कई बार सरकार और प्रशासन से गुहार लगाई। कई बार जब नेता चुनाव के समय घर में वोट लेने आए तो उन्होंने वादा भी किया, लेकिन स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया। कोई हाथ मदद के लिए ऐसा नहीं उठा जो हमारी तकलीफ को कम कर सके। उल्टा हमारी समस्या बढ़ती गई और स्थिति बद से बदतर होती गई। बोले- एक लाख के कर्ज में डूब गया हूं
महेश साकेत का कहना है कि जैसे ही बच्चे 6 साल की उम्र को क्रॉस करते हैं, उन्हें चलने-फिरने में समस्या होने लगती है। वे 5 साल की उम्र तक पूरी तरह से स्वस्थ रहते हैं। चलने की कोशिश करने पर जमीन पर ही गिर जाते हैं। संजय गांधी अस्पताल में डॉक्टर ने चेक किया था, इसके बाद उन्होंने बच्चों में कॉपर डिस्टोनिया नाम की बीमारी बताई। इसके इलाज के लिए लाखों रुपए चाहिए। बीमारी बड़ी होने की वजह से इलाज काफी महंगा है। बच्चों के इलाज के लिए मैंने समूह से एक लाख रुपए का कर्ज लिया, जो अब तक नहीं चुका पाया। गरीब परिवार से ताल्लुक रखता हूं, किसी गरीब व्यक्ति के लिए 1 लाख रुपए बड़ी राशि होती है। रीवा से लेकर प्रयागराज तक इलाज करवाने की कोशिश की। डॉक्टर ने कॉपर डिस्टोनिया बीमारी बताने के बाद 2-3 महंगी जांच लिख दी। इसको करा पाना मेरे लिए संभव नहीं हो पाया। तब से कर्ज के बोझ तले दबे हैं, लेकिन बच्चे उसी स्थिति में जूझ रहे हैं। 15 साल की बेटी का वजन मात्र 25 किलो
महेश साकेत का कहना है कि मेरी शादी वर्ष 2000 में सुशीला के साथ हुई थी। दो साल बाद पहली बेटी हुई। वह भी 6 वर्ष के बाद बीमार रहने लगा। 2011 में उसकी मौत हो गई। नवंबर 2008 में दूसरी संतान स्तुति साकेत हुई। वर्तमान में मेरे चार बच्चे कॉपर डिस्टोनिया बीमारी से पीड़ित हैं, जिसमें स्तुति (15), आजाद (13), प्रशंसा (10), महिमा (8) शामिल हैं। कॉपर डिस्टोनिया बीमारी से पीड़ित 15 साल की बेटी का वजन महज 25 kg है। जो सामान्य से भी बेहद कम है। बीमारी की वजह से दो बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया है। वे कक्षा चार तक शासकीय प्राथमिक शाला बांसगांव में पढ़ने के लिए नियमित रूप से जाया करते थे। आजाद को स्कूल छोड़े हुए 3 साल का समय हो गया, जबकि स्तुति को स्कूल छोड़े हुए 5 साल से अधिक समय हो गया। दोनों पढ़ाई में बहुत होनहार थे, जो मन लगाकर पढ़ाई करते थे। लेकिन धीरे-धीरे उनके शरीर को बीमारी ने जकड़ लिया। एक समय वह भी आया जब दोनों स्कूल जाने में असमर्थ होने लगे। मांसपेशियों के जकड़ जाने के वजह से चलते हुए रास्ते में ही गिरने लगे। शिक्षक भी उन्हें सभी बच्चों के साथ बैठाने में संकोच करने लगे। जिसके कारण से दोनों अब स्कूल नहीं जाते। इलाज करवा दें या सभी को इच्छामृत्यु दे दो
महेश साकेत का कहना है कि प्रदेश सरकार से इलाज कराने की गुहार लगा चुके हैं। स्थानीय विधायक नरेंद्र प्रजापति से लेकर अन्य जनप्रतिनिधियों ने भी इलाज का आश्वासन दिया था, लेकिन अब तक कोई मदद के लिए आगे नहीं आया है। ऐसे में जनप्रतिनिधियों से ही आस है। अन्यथा मेरे परिवार को सामूहिक मृत्यु दे दी जाए। मैं बहुत दुखी और आहत हो चुका हूं, अगर समय रहते हमें मदद नहीं मिली तो हम खुद ही अपने आप को खत्म कर लेंगे। ऐसी जिंदगी जीने से तो मौत बेहतर है। तीन तरह की बीमारी घातक रासायनिक असंतुलन से होती है बीमारी
माना जाता है कि यह मस्तिष्क के एक विशेष क्षेत्र में रासायनिक असंतुलन के कारण हो सकता है। बेसल गैग्लिया (मस्तिष्क के केंद्र के पास संरचनाओं का एक समूह) कहा जाता है, जहां मांसपेशियों के संकुचन को शुरू करने के लिए संदेश पैदा होते हैं। बेसल गैग्लिया मस्तिष्क में गहरी संरचनाएं हैं जो आंशिक रूप से गति को कंट्रोल करने के लिए जिम्मेदार हैं। वे शरीर को हिलाने के लिए आवश्यक कई मांसपेशियों के संकुचन को नियंत्रित करते हैं। यदि मस्तिष्क का यह हिस्सा किसी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो जब हम हिलने की कोशिश करते हैं तो गलत मांसपेशियां सिकुड़ जाती हैं। जब हम स्थिर होते हैं तब भी मांसपेशियां अनावश्यक रूप से सिकुड़ती हैं, जिससे अनियंत्रित ऐंठन, कंपन और संकुचन होता है। इन ऐंठन को डिस्टोनिक मूवमेंट के रूप में जाना जाता है। कुछ रोगियों को ऐसी बीमारी या चोट लग सकती है। डिस्टोनिया एक न्यूरोलॉजिकल मूवमेंट डिसऑर्डर है, जिसके कारण मांसपेशियों में अनियंत्रित संकुचन होता है। इससे पीड़ित लोगों को असामान्य मुद्रा और बार-बार घुमावदार हरकतें होती हैं। ये हरकत दर्दनाक हो सकती हैं और रोजमर्रा के काम में बाधा डाल सकती हैं।


