राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग से यौन अपराध (पॉक्सो) के एक मामले को रद्द करते हुए केन्द्र सरकार को पॉक्सो कानून में रोमियो-जूलियट (सहमति वाले रिश्ते पॉक्सो से अलग) का प्रावधान जोड़ने का सुझाव दिया है। जस्टिस अनिल उपमन की अदालत ने यह आदेश 19 साल के युवक की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। कोर्ट ने कहा- देशभर में पॉक्सो के तहत दर्ज मामलों का एक बड़ा हिस्सा रोमियो-जूलियट प्रकृति का है। जहां किशोर-किशोरी (नाबालिग) अथवा किशोर-युवा (नाबालिक और बालिग) आपसी सहमति से संबंध में होते हैं। लेकिन उम्र के तकनीकी अंतर और सामाजिक-पारिवारिक असहमति के चलते पूरा मामला गंभीर आपराधिक मुकदमे में बदल दिया जाता है। 12 जनवरी को हुई सुनवाई में अदालत ने कहा- मौजूदा कानूनी ढांचा यौन शोषण और सहमति से बने किशोर संबंधों के बीच फर्क करने में नाकाम रहता है। पॉक्सो में आपसी सहमति को महत्व नहीं कोर्ट ने कहा कि हम उन आकड़ों को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं, जो पॉक्सो कानून लागू होने के बाद सामने आए हैं। इसमें एक बड़ा प्रतिशत उन स्थितियों से जुड़ा है, जहां 16 से 18 साल की उम्र के बीच किशोर और युवा एक कमिटेड रिलेशनशिप में हैं। इस तरह के मामले साल 2012 से पहले अपराध की श्रेणी में नहीं आते थे। लेकिन पॉक्सो कानून लागू होने के बाद अब लड़की की सहमति की परवाह किए बिना इन्हें एक दंडनीय अपराध मान लिया जाता है। पुलिस-ट्रायल कोर्ट ने मशीनरी काम किया अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि इस मामले में एक 19 साल के युवा के खिलाफ 17 साल की किशोरी का अपहरण करके उसके साथ यौन शोषण करने का मामला पॉक्सो कानून के तहत दर्ज किया गया। लेकिन यहां पुलिस और ट्रायल कोर्ट ने एक मशीनरी की तरह काम किया। जबकि किशोरी पुलिस और ट्रायल के कोर्ट को दिए बयानों में साफ कह रही है कि वह अपनी मर्जी से अपने घर से गई थी। युवक ने उसके साथ कोई जबरदस्ती नहीं की। न ही दोनों के बीच कोई संबंध सहमति अथवा जबरन बना। वहीं, मेडिकल रिपोर्ट में भी यौन शोषण की पुष्टि नहीं हुई। लेकिन उसके बाद भी पुलिस ने अपहण और रेप की धाराओं में चालान पेश किया। वहीं, ट्रायल कोर्ट ने युवक पर चार्ज भी फ्रेम कर दिए। कोर्ट आंखे नहीं मूंद सकती है कोर्ट ने कहा- यह कानून बच्चों को सेक्सअुल शिकारियों और शोषण करने वालों से बचाने के लिए बनाया गया था। यह नहीं कहा जा सकता कि कानून बनाने वालों का इरादा इस सख्त कानून का इस्तेमाल उन युवाओं को परेशान करने के लिए करना था, जो आपसी सहमति से, भले ही सामाजिक रूप से अस्वीकार्य, रिश्तों में शामिल हैं। जब पीड़िता खुद आरोपी को बेगुनाह बता रही है, मेडिकल रिपोर्ट भी उसका समर्थन करती है। यह कोर्ट आंखें नहीं मूंद सकता है। हम युवक के खिलाफ दर्ज एफआईआर और ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई को रद्द करने का आदेश देते हैं। 2012 में लागू हुआ था POCSO 2012 में बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए भारत में POCSO कानून लाया गया था। पहले 2017 में 33,210 मामले दर्ज हुए थे, जो 2022 तक दोगुने से ज्यादा हो गए। रिपोर्टिंग बढ़ने का मतलब है कि लोग अब चुप नहीं रहते, लेकिन वास्तविक मामले इससे कहीं ज्यादा हो सकते हैं। …. राजस्थान हाईकोर्ट से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… हाईकोर्ट ने कहा- छात्राओं के लिए स्कूलों में टॉयलेट नहीं:वे पानी नहीं पी पाती; शिक्षा सचिव से कहा- हम बच्चों को जवाब नहीं दे पा रहे राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश के सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों और क्लासरूम को लेकर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने शिक्षा सचिव कृष्ण कुणाल से कहा- आप स्वच्छ भारत मिशन की बात करते हो, लेकिन आप स्कूल में बच्चियों के लिए टॉयलेट की व्यवस्था भी नहीं कर पा रहे हैं। (पूरी खबर पढ़ें)


