अपने जीवन में व्यर्थ का अहंकार नहीं पालंे : सुयश सागर महाराज

हमारे भाव एक क्षण के अंदर फर्श से अर्श और उसी क्षण अर्श से फर्श की ओर होते देखे जाते है। आज जो अमीर है कल वही फकीर दिखाई देता है। कर्मों की स्थिति बड़ी से विचित्र है। यह विचार जैन मुनि श्री 108 सुयश सागर महाराज ने धर्म सभा में व्यक्त किए। श्री दिगंबर जैन भवन सभागार में सोमवार को प्रवचन जारी रखते हुए जैन मुनि ने कहा कि सब दिन एक जैसे नहीं होते और सबके दिन एक से नहीं होते। प्रवचन में उन्होंने समाज को संदेश दिया कि हम अपने जीवन में व्यर्थ का अहंकार नहीं पाले। मुनिश्री ने कहा कि किसी पापी को देखकर धार्मिक क्रियाएं करने से मत रोको, क्योंकि हम नहीं जानते कि कब साधु संगीत को पाकर उस जीव के परिणाम बदल जाए। हमारा इतिहास इस प्रकार के चरित्रों से भरा हुआ है। 26 दिसंबर को जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्र प्रभु और 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जन्म और तप कल्याणक महोत्सव मुनि 108 श्री सुयश सागर महाराज के सानिध्य में मनाया जाएगा। धर्मसभा का संचालन मंत्री पंकज पांड्या ने किया। इस अवसर पर समाज के अध्यक्ष नरेन्द्र गंगवाल, उपाध्यक्ष प्रदीप बाकलीवाल, पूर्व अध्यक्ष पूरणमल सेठी, नरेंद्र पांड्या, छीतरमल गंगवाल, पदम छाबड़ा विशेष रूप से उपस्थित थे। श्री दिगंबर जैन भवन सभागार प्रवचन जारी

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