ओपीडी पेशेंट्स को बड़ी राहत देने की तैयारी…
रिम्स में इलाज के लिए आने वाले ओपीडी मरीजों को जल्द बड़ी राहत मिलने वाली है। अब तक जिस परेशानी से रोजाना हजारों मरीज जूझ रहे थे, उसे दूर करने की दिशा में रिम्स प्रबंधन ने ठोस पहल शुरू कर दी है। प्रबंधन ने तय किया है कि ओपीडी में डॉक्टर जो दवाएं लिखेंगे, वही दवाएं रिम्स की फार्मेसी में उपलब्ध कराई जाएंगी, ताकि मरीजों को बाहर से महंगी दवाएं खरीदने के लिए विवश न होना पड़े। वर्तमान में रिम्स में कैंसर विभाग के लिए 36 करोड़ से अधिक के अत्याधुनिक उपकरणों की खरीद प्रक्रिया अंतिम चरण में है। प्रबंधन अब ओपीडी पेशेंट्स की मूलभूत जरूरतों पर भी फोकस कर रहा है। ओपीडी में दवाओं की अनुपलब्धता को लेकर लंबे समय से शिकायतें मिल रही थीं, जिसे देखते हुए अब व्यवस्था सुधारने की तैयारी है। दवाओं की सूची तैयार करने का निर्देश
रिम्स के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. हिरेन बिरूआ ने बताया कि ओपीडी में आए मरीजों से लगातार यह फीडबैक मिल रहा था कि डॉक्टर जो दवाएं लिखते हैं, वे अस्पताल की फार्मेसी में उपलब्ध ही नहीं रहतीं। ऐसे में मरीजों को बाहर की दुकानों से दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। डॉ. बिरूआ के अनुसार, डॉक्टरों के साथ बैठक कर यह तय किया गया है कि ओपीडी में अधिकतर प्रेस्क्राइब की जाने वाली दवाओं की सूची तैयार की जाए। सभी चिकित्सकों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने विभाग से दवाओं की सूची बनाकर विभागाध्यक्ष के माध्यम से सौंपेंगे। इसके बाद उन दवाओं को फार्मेसी के स्टॉक में शामिल किया जाएगा, जिनकी जरूरत सबसे ज्यादा है। ओपीडी में रोज आते हैं 2000 मरीज, दवाएं नाम मात्र की रहती हैं
फिलहाल रिम्स की ओपीडी फार्मेसी की स्थिति काफी चिंताजनक है। अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन औसतन 2000 मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं, लेकिन फार्मेसी में दवाओं की उपलब्धता बेहद सीमित है। ओपीडी डिस्पेंसरी में मरीजों के लिए 62 दवाओं की सूची बोर्ड पर लिखी गई है, लेकिन इनमें से 51 दवाएं स्टॉक में उपलब्ध ही नहीं हैं। मरीजों की मजबूरी…गैस, दर्द, उल्टी जैसी सामान्य दवाएं भी बाहर से ही खरीदनी पड़ रही है
दवाओं की अनुपलब्धता के कारण मरीजों और उनके परिजनों को रोजाना भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है। ओपीडी में डॉक्टर द्वारा लिखी गई अधिकांश दवाएं मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। स्थिति यह है कि गैस, दर्द, उल्टी जैसी सामान्य बीमारियों की सस्ती दवाएं भी मरीजों को बाहर से लानी पड़ रही हैं। यहां तक कि पैन-40, ट्रामाडोल, ओंडम जैसे इंजेक्शन भी मरीजों के परिजन बाहर से खरीद कर ला रहे हैं। इससे न सिर्फ इलाज में देरी हो रही है, बल्कि गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी पड़ रहा है।
सूची में 36 टैबलेट, उपलब्ध सिर्फ 7
18 सिरप, सैशे और ड्रॉप्स में से केवल 3 सिरप उपलब्ध हैं।
8 आइंटमेंट, आई व इयर ड्रॉप में से एक भी दवा उपलब्ध नहीं है।
यानी वर्तमान में फार्मेसी में केवल 7 टैबलेट, 3 सिरप और एक माउथवॉश ही मरीजों को मिल पा रही है। आईपीडी मरीजों को मिल रहीं दवाएं
रिम्स प्रबंधन का दावा है कि अस्पताल में 700 से अधिक प्रकार की दवाएं नि:शुल्क उपलब्ध कराई जा रही हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह सुविधा मुख्य रूप से आईपीडी मरीजों तक सीमित है। ओपीडी मरीज इस दायरे से लगभग बाहर हैं, जबकि सबसे ज्यादा मरीज रोजाना ओपीडी के जरिए ही इलाज के लिए पहुंचते हैं। ये होगा लाभ : ओपीडी में आते हैं सबसे अधिक मरीज, बढ़ेगा भरोसा
अब प्रबंधन की नई पहल से उम्मीद जगी है कि आने वाले दिनों में ओपीडी मरीजों को भी राहत मिलेगी। यदि डॉक्टरों द्वारा लिखी जाने वाली जरूरी दवाएं फार्मेसी में उपलब्ध होने लगेंगी, तो इससे मरीजों का इलाज सस्ता होगा। बाहर की दवा दुकानों पर निर्भरता घटेगी, इलाज में देरी कम होगी और रिम्स की ओपीडी व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बढ़ेगा। रिम्स प्रबंधन की यह पहल अगर जमीन पर पूरी तरह लागू होती है तो यह ओपीडी मरीजों के लिए एक बड़ा बदलाव साबित होगी।


