डूंगरपुर में अरावली बचाओ अभियान के तहत भील प्रदेश विद्यार्थी मोर्चा ने कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली श्रृंखला के लिए स्वीकृत नई परिभाषा पर पुनर्विचार की मांग करते हुए राष्ट्रपति के नाम जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। मोर्चा के कार्यकर्ता कलेक्ट्रेट पर एकत्रित हुए और केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। उनके नेताओं ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के अनुसार अब केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृति को ही अरावली पहाड़ी माना जाएगा। इस नए मानक से अरावली की 90% से अधिक पहाड़ियां संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी, जिससे पर्वतमाला पर खतरा बढ़ गया है। मोर्चा का कहना है कि यह नई परिभाषा खनन और भू-माफिया को खुली छूट देने के समान है। नेताओं ने चेतावनी दी कि अरावली पर्वतमाला को कानूनी तौर पर मिटाना जलवायु परिवर्तन और मरुस्थलीकरण को बढ़ावा देगा। आदिवासी क्षेत्रों में अरावली जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा का मूल आधार रही है। आदिवासी समुदाय ने सदियों से इन पर्वतों की रक्षा की है। अरावली की गोद में भील-राजपूत एकता ने कई आक्रमणकारियों और ब्रिटिश शासन को धूल चटाई थी। इसलिए अरावली केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और जीवन आधारित धरोहर है। मोर्चा ने आशंका जताई कि नई परिभाषा लागू होने से अवैध खनन, वनों का विनाश, जलस्रोतों का सूखना और पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ेगा। इसका सीधा प्रभाव किसान, पशुपालक और मानव सभ्यता पर पड़ेगा। प्रदर्शन के बाद, भील प्रदेश विद्यार्थी मोर्चा ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपकर प्रकृति और मानव की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली श्रृंखला की स्वीकृत नई परिभाषा पर तत्काल पुनर्विचार करने की मांग दोहराई।


