झारखंड राज्य बनने के बाद रांची राजधानी बनी। शहर के विकास को लेकर लोगों में उम्मीदें बढ़ीं। लेकिन तीसरी सरकार के बिना लोगों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करना मुश्किल था। इसलिए सरकार पर लगातार नगर निकाय चुनाव कराने का दवाब बढ़ रहा था। आखिरकार वह समय आया, जब वर्ष 2008 में नगर निगम चुनाव की घोषणा हुई। छोटे से लेकर बड़े नेता व पार्टियों में चुनाव को लेकर काफी उत्साह था। लेकिन गैर दलीय आधार पर चुनाव होने की वजह से नेताओं को अपने बलबूते मैदान में उतरना था। रांची के मेयर की सीट आदिवासी महिला के लिए आरक्षित थी। ऐसे में तय था कि कोई आदिवासी महिला ही मेयर बनेगी। उस वक्त झारखंड जनाधिकार मंच के साथ अनेक आंदोलन का हिस्सा रहीं रमा खलखो तेजी से उभरीं। वह चुनाव लड़ीं और करीब 46 हजार वोट लाकर रांची की मेयर बन गईं। इस तरह रांची को पहली आदिवासी महिला मेयर मिली। पहली बार मेयर और डिप्टी मेयर का सीधा चुनाव हुआ था। आम लोग भी मतदान में बढ़-चढ़ कर शामिल हुए थे। इसलिए लोगों को निगम से काफी अपेक्षाएं थीं। मेयर रमा खलखो के नेतृत्व में पहली बोर्ड ने अपने पांच साल के कार्यकाल में समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की किरण पहुंचाने का प्रयास किया। काफी काम ऐसे हुए जो पहली बार हो रहे थे। उस समय रांची को स्वच्छ और सुंदर बनाने का संकल्प लिया गया था। मेयर के नेतृत्व में निगम की टीम ने बेहतरीन काम करते हुए पहली बार सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम को लागू किया। इसके लिए एटूजेड कंपनी का चयन किया गया। प्रत्येक घर में गीला-सूखा कूड़ा रखने के लिए दो-दो डस्टबिन बांटे गए थे। कूड़े का उठाव सिस्टेमेटिक हुआ। झिरी डंप यार्ड में कूड़ा भेजा जाने लगा। इसके बाद स्वच्छता के प्रति लोग जागरूक हुए। रांची में शहरी जलापूर्ति योजना पर उसी समय काम शुरू हुआ। पहली बार जेएनएनयूआरएम योजना के तहत 70 सिटी बसों की खरीदारी निगम ने की। बेघरों को लेकर मधुकम खादगढ़ा और मधुकम रूगड़ीगढ़ा में बीएसयूपी आवास, चिरौंदी में गरीबों के लिए आवास और नामकुम में वाल्मिकी आवास का निर्माण कराया गया। निगम का सालाना रेवेन्यू 15 करोड़ तक पहुंच गया : रमा
मैं जब रांची की मेयर बनी थी, उस समय काफी काम करने का मौका मिला। नगर निगम का सालाना रेवेन्यू 8 करोड़ रुपए था। इस वजह से बहुत सारे काम करने मुश्किल थे। इसलिए रेवेन्यू बढ़ाने पर जोर दिया गया। सबसे पहले मैंने राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल के सलाहकार से मिलकर नक्शा पास करने का मुद्दा उठाई। उस समय आरआरडीए घरों का नक्शा पास करता था। इसलिए उसे आने वाला सारा रेवेन्यू आरआरडीए के पास जाता था। मैंने नगर निगम के अधिकार पर अतिक्रमण का मुद्दा उठाया तो उन्होंने इसमें सुधार का भरोसा दिया। इसके बाद शहरी क्षेत्र में नक्शा पास करने का अधिकार नगर निगम को मिला। होल्डिंग और वाटर कनेक्शन से कलेक्शन बढ़ाया गया। लोगों को बेहतर सुविधा मिलने लगी तो उन्होंने टैक्स देना शुरू किया। ऐसे में देखते ही देखते नगर निगम का सालाना आय 15 करोड़ रुपए पर पहुंच गई। उस समय पार्षदों की टीम को दूसरे शहरों की व्यवस्था देखने का मौका मिला।


