रांची नगर निगम चुनाव का रंग तेजी से चढ़ रहा है। सोमवार से नामांकन करने वालों की संख्या बढ़ेगी। इस बार वार्डों के आरक्षण से पुराने नेताओं की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। ऐसे में कोई प|ी तो कोई बहन-बेटी को चुनावी दंगल में उतारने में जुटा है। यह परंपरा कोई नई नहीं है। रांची में पिछले 18 वर्षों में तीन बार नगर निगम चुनाव हुए हैं। सभी में कमोबेश ऐसी ही स्थिति रही है। जब-जब वार्डों का समीकरण बिगड़ा है, उन वार्डों पर उसी परिवार का कब्जा रहा। वर्ष 2008 और 2013 में कुल 55 वार्डों में चुनाव हुए थे। इसके बाद परिसीमन हुआ तो वार्डों की संख्या 55 से घटकर 53 हो गई। वार्ड बदल गए, लेकिन 9 वार्ड ऐसे हैं जिसपर एक ही परिवार का कब्जा रहा है। कभी पति चुनाव जीता तो कभी प|ी और कभी बहन तो कभी भाभी। मतलब नए लोगों को उन 9 वार्डों में जीतने का मौका नहीं मिला। इसलिए ये वार्ड परिवारवार्ड बनकर रह गए हैं। वहीं, निगम क्षेत्र में कुल 11 वार्ड ऐसे हैं, जहां परिसीमन के बाद वार्ड का नंबर तो बदल गया। लेकिन पहली बार जो पार्षद चुनाव जीतकर आए, वे लगातार तीन बार जीतते रहे। मतलब वार्ड की जनता पुराने पार्षदों पर ही अपना भरोसा बनाए हुए है। इन पार्षदों पर लगातार भरोसा कायम रहा वार्ड-4 हुस्ना आरा लगातार तीन बार जीती वार्ड-7 सुजाता कच्छप लगातार तीन बार जीती वार्ड-12 कुलभूषण डुंगडुंग लगातार दो बार जीते वार्ड-16 नाजिमा रजा लगातार तीन बार जीते वार्ड-23 साजदा खातून लगातार तीन बार जीती वार्ड-27 ओमप्रकाश लगातार तीन बार जीते वार्ड-33 अशोक यादव लगातार तीन बार जीते वार्ड-38 सविता कुजूर लगातार तीन बार जीते वार्ड-44 उर्मिला यादव लगातार तीन बार जीती वार्ड-49 कविता सांगा तीन बार जीती { वार्ड-50 कुमारी मार्गेट दो बार जीती। वार्ड-1 में 2008 में नकुल तिर्की पार्षद बने। इसके बाद 2013 में उनकी प|ी सुनीता तिर्की पार्षद बनीं। परिसीमन के बाद 2018 में फिर नकुल तिर्की पार्षद बने। वार्ड-6 से 2013 में अशोक खलखो पार्षद बने। फिर 2018 में उनकी प|ी मोनिका खलखो पार्षद बनीं। वार्ड-17 से मो. सलाउद्दीन दो बार पार्षद रहे, लेकिन वर्ष 2018 के चुनाव में उनकी भाभी शबाना खान पार्षद बनीं। वार्ड-19 से वर्ष 2008 के चुनाव में राजेश गुप्ता छोटू पार्षद बने, लेकिन इसके बाद उनकी बहन आशा देवी और जब वार्ड बदल गया तो फिर बहन ही पार्षद बनीं। वार्ड-20 से सुनील यादव पहली बार पार्षद बने, वर्ष 2013 में उनकी प|ी निकिता देवी पार्षद बनीं। परिसीमन के बाद वार्ड बदल गए तो दुबारा सुनील यादव पार्षद बने। वार्ड-21 से पहली बार सुजीत उरांव पार्षद बने, लेकिन दूसरी बार उनकी प|ी रोशनी खलखो पार्षद बनीं। 2018 में वार्ड बदलकर 19 नंबर हो गया, लेकिन रोशनी खलखो ही पार्षद बनीं। वार्ड-24 से 2013 में सबा नाज पार्षद बनीं, जब वार्ड नंबर बदलकर 21 हो गया तो उनके पति एहतेशाम पार्षद बने। वार्ड-25 से सबसे पहले मो. असलम पार्षद बने, दूसरी बार उनकी प|ी सबा नाज पार्षद बनीं। वर्ष 2018 में वार्ड बदलकर वार्ड नंबर-22 हो गया, लेकिन फिर मो. असलम ही पार्षद बने। वार्ड-35 से पहली बार सुनील टोप्पो पार्षद बने, दूसरी बार फिर वे पार्षद बने। वार्ड बदलकर 33 होने पर उनकी बहन पुष्पा टोप्पो पार्षद बनीं। ऐसे समझिए किस-किस वार्ड में परिवार का रहा कब्जा


