आईजीकेवी में खुलेगा न्यूक्लियर एनर्जी एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर:गामा किरणों से पारंपरिक फसलों की बढ़ेगी उत्पादकता, बीजों को नहीं भेजना पड़ेगा मुंबई

कृषि और खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ नई छलांग लगाने जा रहा है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में न्यूक्लियर एनर्जी एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर खुलेगा। राज्य सरकार ने इसके लिए 6 करोड़ रुपए की मंजूरी दी है। पहले चरण में 2.5 करोड़ जारी भी कर दिए। उम्मीद है कि सेंटर मार्च तक शुरू हो जाएगा। अब तक नई किस्मों की जांच के लिए बीज को मुंबई के बार्क केंद्र में भेजना पड़ता था। इसमें लगभग एक से दो माह लगते थे। अब रायपुर में ही यह सुविधा उपलब्ध हो जाने से अनुसंधान कार्य में तेजी आएगी। सेंटर का एक महत्वपूर्ण कार्य रेडी-टू-ईट और रेडी-टू-यूज फूड प्रोडक्ट्स की सेल्फ लाइफ बढ़ाने पर भी होगा। इसकी स्थापना में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (बार्क) सहयोग करेगा। इसमें गामा रेडिएशन प्लांट स्थापित होगा, जो फसल किस्मों के विकास के लिए जरूरी है। इसके लिए बार्क मुंबई और कृषि विवि के बीच रिसर्च को लेकर एमओयू हुआ है। इसके अनुसार विश्वविद्यालय और बार्क के वैज्ञानिक मिलकर शोध, प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करेंगे, ताकि अनुसंधान के लाभ सीधे किसानों तक पहुंच सकें। आने वाले दिनों में इसे सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित करने के लिए अलग से एमओयू होगा। गामा किरणों के माध्यम से पैकेजिंग मटेरियल की अवधि बढ़ाई जा सकेगी। साथ ही, खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता और सुरक्षा की वैज्ञानिक जांच कर उन्हें साइंटिफिक सर्टिफिकेट प्रदान किया जाएगा। बताया जा रहा है कि यह सेंटर केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उड़ीसा, झारखंड और बिहार जैसे राज्यों के बीजों और फसल किस्मों के विकास में भी सहयोग करेगा। मध्य-पूर्व भारत में यह अपनी तरह का एकमात्र केंद्र होगा। मार्च तक सेंटर स्थापित हो जाएगा
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल का कहना है कि कृषि विवि के कैंपस में न्यूक्लियर एनर्जी एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर की स्थापना की जाएगी। इसके लिए शासन से अभी ढ़ाई करोड़ रुपए की स्वीकृति मिली है। योजना के अनुसार मार्च 2026 तक यह सेंटर स्थापित होने की संभावना है। शुरुआत में दलहनी और तिलहनी फसलों के विकास पर काम होगा। ताकि इन फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ उन्नत एवं रोग प्रतिरोधक किस्मों का विकास किया जा सके। पारंपरिक किस्मों की उपज क्षमता बढ़ाने पर काम होगा
कृषि विवि के डायरेक्टर रिसर्च डॉ. विवेक त्रिपाठी और कृषि विवि के प्रोफेसर डॉ. दीपक शर्मा ने बताया कि गामा तकनीक के माध्यम से पारंपरिक किस्मों की उपज क्षमता बढ़ाई जाएगी, जबकि उनके मूल गुण और स्वाद बरकरार रहेंगे। धान की पारंपरिक किस्में जैसे विष्णुभोग, जवाफूल, सफरी-17, लुचई, सोना गाठी और लाइचा पर पहले से ही जीनोमिक स्तर पर काम किया जा चुका है। इसे अब और आगे बढ़ाया जाएगा। इसके साथ ही दलहन, तिलहन, फल और सब्जियों की उच्च उपज और लंबी सेल्फ लाइफ पर भी अनुसंधान होगा।

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