आचार्य महाश्रमण बोले- जाति-धर्म को लेकर दंगे फसाद से बचें:न्यायालय भी जाना पड़े तो झूठ नहीं बोलना चाहिए,असली धर्म अहिंसा

तेरापंथ श्वेतांबर जैन परंपरा के 11वें आचार्य महाश्रमण ने बुधवार को अजमेर शहर में 100 साधु-साध्वियों के साथ मंगल प्रवेश किया। अजमेर उनका यह पहला आगमन था, जहां जगह-जगह पर उनका भव्य स्वागत हुआ। विभिन्न क्षेत्रों से शोभायात्राएं भागचंद की कोठी पर पहुंचीं, जहां एक धर्म सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर आचार्य महाश्रमण ने अपने प्रवचनों में जोर देकर कहा कि विभिन्न जातियों, संप्रदायों और राजनीतिक दलों के बीच दंगे, मारपीट, हिंसा या हत्या जैसी घटनाएं नहीं होनी चाहिए। सभी के प्रति सद्भावना रखनी चाहिए, क्योंकि जहां अहिंसा है, वहां शांति है, और जहां हिंसा है, वहां अशांति। उन्होंने लोकतंत्र में सत्य की महत्ता पर बल देते हुए कहा कि झूठ नहीं बोलना चाहिए। यहां तक कि न्यायालय में जाने पर भी संकल्प लें कि झूठी गवाही नहीं देंगे। धर्म सभा में स्पीकर वासुदेव देवनानी, तेलंगाना के संगठन महामंत्री चंद्रशेखर, राज्य मंत्री ओमप्रकाश भडाणा, विधायक अनीता भदेल, डिप्टी मेयर नीरज जैन सहित कई प्रमुख नेता और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। आचार्य महाश्रमण ने आगे कहा कि धर्म ही उत्कृष्ट मंगल है, और इससे बड़ा कोई मंगल नहीं। दुनिया में भले ही अनेक धर्म और संप्रदाय हों, लेकिन शास्त्रों में किसी विशेष संप्रदाय का नाम नहीं लिया गया। असली धर्म अहिंसा, संयम और तप है। जो प्राणी अहिंसा की आराधना करता है, उसका मंगल निश्चित है। अहिंसा एक प्रकार की भगवती है। धर्म और जाति को लेकर दंगे फसाद में नहीं जाना चाहिए उन्होंने जोर दिया कि धर्म या जाति के नाम पर दंगे-फसाद में नहीं पड़ना चाहिए। अहिंसा का मूल सिद्धांत है कि किसी को मारना या दुख नहीं देना। सभी प्राणियों को अपने समान समझें और अपनी ओर से किसी को कष्ट न पहुंचाएं। अलग-अलग जातियों, संप्रदायों या राजनीतिक दलों के लोगों के बीच सद्भावना होनी चाहिए, न कि हिंसा। जहां हिंसा है, वहां अशांति फैलती है, जबकि अहिंसा शांति लाती है। न्यायालय में झूठी गवाही नहीं देनी चाहिए आचार्य ने संयम की महत्ता बताते हुए कहा कि असंयम पाप है। भले ही धन हो, लेकिन व्यक्तिगत जीवन में संयम जरूरी है। न्यायालय में झूठी गवाही न दें और जहां तक संभव हो, झूठ बोलने से बचें। लोकतंत्र में सभी को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन वाणी पर संयम रखकर झूठे आरोप न लगाएं। उन्होंने लोकतंत्र की सफलता के लिए अनुशासन, संयम और कर्तव्यनिष्ठा को आवश्यक बताया। यदि ये न हों, तो लोकतंत्र का विनाश हो सकता है। राजतंत्र हो या लोकतंत्र, सबको न्याय मिलना चाहिए। न्यायपालिका का महत्व अटल है। जीवन में संयम से अपराध कम हो सकते हैं। लोकतंत्र में आजादी का मतलब यह नहीं कि कुछ भी करें; इससे अव्यवस्था फैलेगी। हर क्षेत्र में मर्यादा और नियमों का पालन जरूरी है। अंत में, उन्होंने राजनीति को सेवा का माध्यम बताते हुए कहा कि राजनीति में अहिंसा और नैतिकता बनी रहे, तो देश की सेवा बेहतर ढंग से हो सकती है। शासन करने वाले यदि संयमी हों, तो वे और भी अच्छा कार्य कर सकते हैं।

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