आज के समय में हर कोई खुद को श्रेष्ठ और सही साबित करने में उलझ रहा है

भीलवाड़ा | एक परिचित है, बहसानंद जी। जैसा नाम वैसा काम। बैठे-भले आदमी से बहस करने की आदत है। दिमाग में मोबाइल यूनिवर्सिटी से उठाया ज्ञान भर रखा है। रोज अपनी पसंद का ज्ञान उठाते हैं और दूसरों के दिमाग में ठूंसने में जी-जान लगा देते हैं। कॉन्फिडेंस इतना कि टीवी में झगड़ा करवाने वाले एंकर भी इन्हें देख घबरा जाए। इनकी बात का विरोध कर दो तो भाषा की मर्यादा लांघ कर गला भी पकड़ सकते हैं। एक सुबह ये इधर आ गए और बोले कि इन पड़ौसी देशों को सबक सिखाना बहुत जरूरी है। सबके सब चायना के चक्कर में हैं। आप क्या है कि देश की जानकारी नहीं रखते। मैंने कहा- जी आपकी बात सौ टका सही है, लेकिन पहले अपने उस पड़ौसी से तो बात कर लिजिए, जिसने अपने घर का सारा मलबा आपके घर के बाहर डाल रखा है। पहले उससे निपटए, पड़ौसी देशों को तो सेना और सरकार निपट लेगी। आजकल चारों तरफ ऐसे कई बहसानंद हैं जो अपने घर-परिवार और आसपास से ज्यादा सोशल मीडिया पर नजर रखते हैं। फिर उसी सही गलत मसाले को हथियार बना राष्ट्र-चिंता में निकल पड़ते हैं। आजकल किसी समूह, समाज, समारोह में बातचीत कम, बहस ज्यादा होती है। संवाद की गुणवत्ता में गिरावट आ गई है। हर कोई खुद को श्रेष्ठ और सही साबित करने में उलझ रहा है। कोई किसी की नहीं सुनना चाहता। सब सुनाना चाहते हैं। आज सोशल मीडिया पर कोई मुद्दा उछाल दो, लोग गुड़ पर मक्खियों की तरह टूट पड़ते हैं। अब किसी बहस में पड़ना मतलब आ बैल मुझे मार, तो समझदार लोग ऐसे बहसानंदों के बीच कुछ बोलने के बजाय मौन रहकर मुस्कुराते रहते हैं। यहां बोले भी क्या? आजकल अधिकांश आदमियों पर विचारधाराओं के लेबल चिपके हैं। जो जिस कम्पनी का है उसी के गीत गाएगा। सब चश्मेबद्दूर हैं। आंखों पर चढ़े चश्मे की ताकत भारी पड़ती है। चश्मे फोकस बदल देते हैं। बहरहाल देख रहा हूं चारों तरफ कोई ना कोई चीख रहा है, भाषण दे रहा है, उलझ रहा है, चारों तरफ अजीब सा शोर है। ऐसे में, अपनी छत से रोज एक चिड़िया को देखता हूं जो तिनका तिनका लाकर अपना घौंसला गूंथती है। कुछ देर ठहरती है, गुनगुनी धूप में किसी पेड़ की टहनी पर बैठ कोई गीत गुनगुनाती है। किसी को सुनाने के लिए नहीं, अपने लिए गाती है। इस दौर में, इस शोर में, मैं इस चिड़िया के जैसा जीवन पसंद करता हूं.. बस। के.जी कदम

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