आत्मदाह से रोकने वाली पुलिस ने भेजा वसूली का नोटिस:किसान बोला- जमीन का उचित मुआवजा भी नहीं मिला, अब जान बचाने की कीमत वसूल रहे

मेरी 10 बीघा पुश्तैनी जमीन पर सीमेंट कंपनी ने बिना उचित मुआवजा दिए कब्जा कर लिया था। इसी वजह से मेरे पिता तनाव में थे। 7 लाख कर्ज लेकर उनका इलाज भी करवाया। फिर भी सदमे के कारण चल बसे। मैं परिवार सहित आत्मदाह करने गया था, लेकिन पुलिस ने रोक दिया। अब वही पुलिस मुझसे मेरी जान बचाने की कीमत वसूलने में लगी है। यह पीड़ा किसान विद्याधर यादव की है। वह झुंझुनूं जिले के नवलगढ़ के गोठड़ा के रहने वाले हैं। ये वही विद्याधर यादव हैं, जिन्होंने सीमेंट फैक्ट्री से अपनी जमीन का उचित मुआवजा नहीं मिलने पर इच्छा मृत्यु मांगी थी। 11 दिसंबर को जब परिवार सहित आत्मदाह करने पहुंचे तो इन्हें समझा-बुझाकर सीमेंट कंपनी ने मुआवजे का चेक दे दिया। 4 दिन बाद झुंझुनूं एसपी की ओर से भेजे गए नोटिस ने उनके होश उड़ा दिए। किसान परिवार की जान बचाने के लिए सुरक्षा में लगे सरकारी अमला ने अपना खर्च 9 लाख 91 हजार 577 रुपए बताया है। इसकी वसूली विद्याधर से होनी है। पूरा मामला समझने के लिए भास्कर टीम झुंझुनूं जिले के नवलगढ़ में देवगांव (विद्याधर का हाल निवास) पहुंची। किसान परिवार से बात की। साथ ही लीगल एक्सपर्ट से जाना कि ये नोटिस कितना सही है। दस बीघा जमीन के मुआवजे को लेकर था विवाद
भास्कर टीम किसान विद्याधर से मिलने देवगांव उनके घर पहुंची। विद्याधर हाथ में पुलिस अधीक्षक का जारी किया करीब 10 लाख रुपए का नोटिस लिए मायूस बैठे थे। उनके बड़े भाई सुखदेव भी में ही थे। विद्याधर ने बताया- अभी वह जिस मकान में खड़े हैं, वो सीमेंट कंपनी ने हमारा पुश्तैनी मकान तोड़ने के एवज में डेढ़ साल के लिए रहने को दिया है। हमारा पुश्तैनी मकान तो गोठड़ा गांव में हमारे खेत में था। उसे कंपनी ने ध्वस्त कर दिया। हमारी दोनों भाइयों की 10 बीघा खेती की पुश्तैनी जमीन थी, जो खनन क्षेत्र में आ चुकी थी। वहां सीमेंट की फैक्ट्री लगने के बाद 2021-22 में जमीन लेने का काम भी शुरू हुआ था। खनन क्षेत्र में घोषित होने के कारण तत्कालीन एडीएम ने 22 लाख 47 हजार 773 रुपए प्रति बीघा के हिसाब से मुआवजा तय किया था। हम इतने कम मुआवजे पर सहमत नहीं थे। इस बीच नवंबर 2022 में सीमेंट कंपनी ने हमारे खेत की तारबंदी तोड़ खनन शुरू कर दिया। तब से ही हमारा मुआवजे को लेकर विवाद चल रहा है। कंपनी दस बीघा जमीन और मकान का मिलाकर 3 करोड़ 5 लाख का मुआवजा देने पर राजी हुई, जो हमारे दो परिवारों के लिए काफी कम था। परिवार का मुख्य रोजगार खेती है, जिसे छीना जा रहा था। पहले हम भाई टाइल्स का काम करते थे, लेकिन आजीविका का मुख्य साधन खेती ही था। हमारी डिमांड 6 करोड़ थी, लेकिन कंपनी नहीं मानी। 4 करोड़ मुआवजे पर सहमति के बावजूद मुकर गए अधिकारी
किसान विद्याधर कहते हैं- मुआवजे पर सहमति नहीं बनी तो हमने भी जगह खाली नहीं की थी। इसी बीच बार-बार मकान खाली करने और जगह छोड़ने के नोटिस आते रहे। करीब 10 महीने पहले फरवरी-मार्च में कंपनी के अधिकारियों और हमारे बीच फिर मीटिंग हुई थी। तब 4 करोड़ 10 लाख मुआवजा और कंपनी में नौकरी पर सहमति हुई थी। बाद में सीमेंट कंपनी के अधिकारी मुकर गए। रोजगार देने से भी इनकार कर दिया। नवंबर में तोड़ा मकान, प्रेग्नेंट पत्नी को धक्के देकर बाहर निकाला
अक्टूबर में कंपनी ने खेत में बने मकान को तोड़ने का नोटिस भिजवाया। इसके बाद 5 नवंबर को कंपनी और प्रशासन ने खेत और मकान खाली करवा लिया। पूरे परिवार को सामान सहित बाहर निकाला। मेरी पत्नी प्रेग्नेंट थी। उसे धक्के दिए गए। हम दोनों भाइयों को ऑफिस में बैठाकर सामने मकान तोड़ा, लेकिन हमने मुआवजा नहीं लिया था। कंपनी के अधिकारी गलत आरोप लगा रहे हैं कि हमने डिमांड बार-बार बदली, जबकि कंपनी से सहमति बनी ही नहीं थी। चूंकि हमारा समझौता हुआ ही नहीं था तो घर-जमीन से कैसे कोई बेदखल कर सकता है। इच्छा मृत्यु की मांग की, फिर हुआ समझौता
विद्याधर ने बताया कि कंपनी के बार-बार दबाव बनाने की वजह से हम परेशान हो गए थे। इसी के चलते 9 दिसंबर को हमने एसडीएम नवलगढ़ को ज्ञापन देकर इच्छा मृत्यु की मांग की। हम खराब आर्थिक स्थिति से जूझ रहे थे। परिवार में विद्याधर के दो बेटियां हैं। सुखदेव के एक बेटा और एक बेटी है। बच्चों की स्कूल फीस, खाने का बंदोबस्त करना था। समाधान नहीं हुआ तो हमने 11 दिसंबर को इच्छा मृत्यु के लिए फैक्ट्री गेट पर परिवार के साथ गए। उस दिन बाकी किसान भाई भी मेरे समर्थन में आ गए थे। पुलिस ने हमें रोका। घर छुड़वाया। बहुत हंगामा हुआ। इसके तीन दिन बाद कंपनी की तरफ से फिर बात हुई। कुल चार करोड़ में मुआवजे की सहमति बनी, लेकिन उसके बाद अब पुलिस का नोटिस आ गया। पिता को खो चुके, मां हार्ट पेशेंट
विद्याधर ने बताया कि हमने यह समझौता भी मजबूरी में किया है। मां की तबीयत बहुत खराब रहने लगी थी। मकान तोड़ने के बाद उनके भी हार्ट में प्रॉब्लम सामने आई। सीकर में हार्ट अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है। पत्नी आठ महीने की प्रेग्नेंट है। डॉक्टर ने तनाव लेने से मना किया है। विद्याधर के भाई सुखदेव ने बताया पहले ही पिताजी को इसी डिप्रेशन के चक्कर में खो चुके हैं। वे हार्ट के मरीज थे। फैक्ट्री से विवाद के बाद वे तनाव में रहने लग गए थे। माइनिंग हमारे मकान से बीस फीट की दूरी पर होती थी। उससे भी परेशानी हो रही थी। जुलाई 2023 को उनकी मौत हो गई। ऐसे में मजबूरी में समझौते की तरफ बढ़े। घर चलाने के लिए ब्याज पर लिया कर्ज
किसान विद्याधर ने बताया कि मैं ओर मेरा भाई पहले मुंबई में टाइल्स का काम करते थे। कंपनी जब खेत की तारबंदी तोड़ी तब से विद्याधर गांव आ गया था। अब कमाई का कोई जरिया नहीं था। खेती की जमीन पर खनन शुरू हो चुका था। इसलिए दो रुपए सैकड़ा ब्याज पर 7 लाख रुपए का कर्ज लिया। पिता का इलाज भी कर्ज के पैसों से करवाया। उनके देहांत के बाद और मुआवजा विवाद के चलते आर्थिक स्थिति और कमजोर होती जा रही थी। समझौता होने के बाद पुलिस ने थमाया नोटिस
सुखदेव बताते हैं- 11 दिसंबर को फैक्ट्री के बाहर हुए प्रदर्शन के बाद मजबूरी में सही लेकिन हमारा कंपनी से समझौता हो चुका था। 18 दिसंबर को पुलिस की तरफ से हमारी सुरक्षा में तैनात पुलिस टीम का खर्च चुकाने का 9 लाख 91 हजार रुपए का नोटिस आना समझ से परे है। विद्याधर ने आरोप लगाया कि पुलिस तो फैक्ट्री मालिकों की तरफ से काम कर रही है। मुझे नोटिस जारी कर यह कहा गया है कि मेरी सुरक्षा में टीम लगाई गई थी। ये उसका खर्चा है। मैं सवाल पूछता हूं- क्या पुलिस वालों को मैंने सुरक्षा के लिए बुलाया था। जब मेरा मकान तोड़ा जा रहा था, तब भी पुलिस की टीम आई थी। तब क्यों नहीं कंपनी से पैसे वसूले गए। क्या पुलिस प्रशासन ने मुझे उसका हर्जाना दिया क्या? एसपी बोले- अभी नोटिस दिया है, आगे कानूनी प्रक्रिया अपनाएंगे
झुंझुनूं जिला एसपी शरद चौधरी ने कहा- बिल्कुल सही नोटिस जारी किया गया है। ऐसे तो हर दूसरा आदमी अपनी मांग मनवाने के लिए सुसाइड की धमकी देगा। हमारी टीमें वहां लगी थीं। उसका जो भार पड़ा है, उसी की वसूली का नोटिस है। अगर विद्याधर जमा नहीं करवाता है तो हम कोर्ट की प्रक्रिया अपनाएंगे। लोगों को यह मैसेज जाना भी जरूरी है कि मांगे मनवाने का यह तरीका सही नहीं है। गोठड़ा थाने के एसएचओ कमलेश चौधरी ने कहा- अभी नोटिस दिया है। इसके अलावा किसान विद्याधर पर मुकदमा अलग से दर्ज है। नोटिस के जवाब के बाद आगे की जो भी कार्रवाई होगी अमल में लाई जाएगी। लीग एक्सपर्ट बोले- नोटिस गलत
किसान को नोटिस जारी करने को लेकर क्षेत्र में भारी विरोध है। लीगत एक्सपर्ट और राजस्थान हाई कोर्ट के एडवोकेट विवेक नंदवाना कहते हैं- यह नोटिस ही गलत जारी हुआ है। राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2007 की धारा 46 में पुलिस सेवा के लिए संदाय का कानूनी प्रावधान है। इसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति धन लाभ के लिए ऐसा कोई भी जलसा, प्रदर्शन करता है, केवल उस स्थिति में ही लोक सुरक्षा एवं लोक शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की फीस वसूली जा सकती है। यह मामला अलग है। पुलिस को इस संबंध में पहले ऐसे व्यक्ति को अवगत करवाना चाहिए था। राजकीय खर्चा हमेशा अग्रिम सूचना देकर वसूला जाता है। इसलिए पुलिस की ओर से दिए गए इस नोटिस के आधार पर पुलिस विभाग को कोई कानूनी कार्रवाई करने से बचना चाहिए। वैसे भी आमजन को सुरक्षा उपलब्ध करवाना राज्य सरकार का दायित्व है। नोटिस तो जारी कर दिया, लेकिन यह खारिज ही होगा।

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