आदिवासियों की ढुकू प्रथा…पति-पत्नी करते हैं दूसरी शादी:अंबिकापुर में 22 पंचायतों के 200 बच्चे प्रभावित; पिता के साए और मां की ममता से दूर

छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की ढुकू प्रथा के दंश से नाबालिगों की जिंदगी पर बुरा असर पड़ रहा है। अंबिकापुर जिले में एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) की तरफ से इस कुप्रथा पर किए गए सर्वे में चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, सीतापुर ब्लॉक के 22 पंचायतों के 33 पारा-टोला में रहने वाले 200 बच्चे मां के ढुकू हो जाने, या पिता द्वारा ढुकू लेकर आने की वजह से शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं। भास्कर की पड़ताल भास्कर ने 3 दिनों तक इन पंचायतों में ढुकू परिवारों को खोजा। सर्वे करने वाले पथ प्रदर्शक (चाइल्ड राइट्स यू क्राय) एनजीओ के सदस्यों के साथ इनसे बात की, क्योंकि उन्हें हिंदी नहीं आती। ढुकू क्यों? इसके 2 जवाब मिले। पहला- दूसरे पुरुष या महिला के प्रति आकर्षण या प्यार। दूसरा- पति या पत्नी की मौत के बाद घर बसाना। इस प्रथा के चलते प्रभावित 2 लड़कियों का बाल विवाह होने जा रहा था। इसे रोका गया, 2 बालश्रम रोके गए। 1 लड़की की बाल तस्करी हो गई थी, जिसे रेस्क्यू किया गया। पड़ताल में ये भी सामने आया कि इस प्रथा के बारे शासन बेखबर है। अगर पूरे आदिवासी इलाके में ऐसा सर्वे हो तो ऐसे मामले कई गुना होंगे। ममता से महरूम बच्चे सहम रहे, संपत्ति हक भी खो रहे भास्कर टीम सीतापुर ब्लॉक के गांवों में ऐसे बच्चों से मिली, जो ढुकू से प्रभावित हैं। ये सभी बच्चे आदिवासी जनजातियों से हैं। पिता की मौत के बाद मां ढुकू हो, या पिता के रहते हुए मां के ढुकू हो जाने या या पिता द्वारा दूसरी मां को ढुकू कर लाने से बच्चे मां की ममता से वंचित हो रहे हैं। उनका पालन-पोषण ठीक से नहीं हो पा रहा। दूसरी पत्नी पहली पत्नी के बच्चों को स्वीकार नहीं करती। परिस्थितियां खराब होने के चलते बच्चे ड्रॉप आउट होते हैं। वे बाल मजदूरी करने को मजबूर हो रहे हैं। बच्चों के साथ सामाजिक भेदभाव होता है। वे शारीरिक-मानसिक रूप से बीमार रहते हैं। पैतृक संपत्ति के बंटवारे में विवाद होता है। बच्चे संपत्ति से वंचित हो जाते हैं। मुश्किल हालात में बच्चों को मदद मिलने के प्रयास हो पथ प्रदर्शक के निदेशक सुशील सिंह ने कहा- सर्वे रिपोर्ट से यह 100 प्रतिशत स्पष्ट है कि समस्या बहुत बड़ी है। ऐसे में प्रभावित बच्चों को मुश्किल हालात में, आर्थिक संकट में कैसे सिस्टम का सपोर्ट मिले इस पर काम होना जरूरी है। सर्वे: महिलाएं 91% होती हैं ढुकू (नोट- 22 ग्राम पंचायतों के 33 पारा टोला के 1,119 परिवार में सर्वे।) मुश्किल हालात में बच्चों को मदद मिलने का प्रयास हो पथ प्रदर्शक के निदेशक सुशील सिंह ने कहा- सर्वे रिपोर्ट से यह 100 प्रतिशत स्पष्ट है कि समस्या बहुत बड़ी है। ऐसे में प्रभावित बच्चों को मुश्किल हालात में, आर्थिक संकट में कैसे सिस्टम का सपोर्ट मिले इस पर काम होना जरूरी है। ढुकू प्रथा क्या है ढुकु का अर्थ आदिवासी समाज में घर में प्रवेश करना है। शादीशुदा पुरुष एक पत्नी के रहते हुए, दूसरी महिला को पत्नी के रूप में ढुकू ले आता है। शादीशुदा महिला भी पति के रहते हुए दूसरे पुरुष को पति मानकर पत्नी के रूप में ढुकू चली जाती है। ढुकू भी 2 तरह के होते हैं। जैसे- अविवाहित महिला या पुरुष किसी, किसी अविवाहित महिला या पुरुष से शादी करता है, यह सिंगल ढुकू कहलाता है। डबल ढुकू यानी शादीशुदा महिला या पुरुष का दूसरी शादी करना। ग्राउंड रिपोर्ट… मां जो ढुकू हो गई, ढुकू लाने वाले पिता का तर्क सुनीता लकड़ा, ढुकू होकर गई मेरी 4 बेटियां हैं। पति की मौत होने के बाद सास-ससुर प्रताड़ित करते थे। मुझे उन्होंने मुझे घर से निकाला। क्या करती। मैं ढुकू होकर गई। मुझे उन्होंने मुझे घर से निकाला। क्या करती। मैं ढुकू फिली लकड़ा, ढुकू होकर गई मैं पहले पति के साथ खुश थी। हमारे 3 बच्चे हुए। लेकिन, वह दूसरी पत्नी (ढुकू) ले आया। मुझे सम्मान, प्यार नहीं मिल रहा था तो क्या करती। बच्चों को छोड़ दूसरे व्यक्ति से शादी की। विजय टोप्पो, ढुकू करके लाया… मैंने 2006 में शादी की थी। कुछ सालों तक सब ठीक था। 2 बच्चे हुए। मगर, पत्नी मायके चली गई। जब भी लेने जाता तो झगड़ा करती। मारती। बच्चों की परवरिश करने के लिए मैं ढुकू ले आया। वह भी तलाकशुदा थी। हां, पहली पत्नी के मेरे बच्चों का पूरा ध्यान रखती है। ग्राम पंचायत आमागुड़ा सीतापुर ब्लॉक 12 साल का सागर, उसकी 13 साल की बहन है शीतल। बीते साल बीमारी से पिता विनोद की मौत हो गई। फिर मां ने ढुकू होकर किसी और की हो गई। बच्चे बेसहारा हुए। बड़ी मां बसंती ने इन बच्चों को अपना लिया। भास्कर इनके घर पहुंचा। बच्चे डरे हुए थे। बोले- मां याद आती है, पर वो चली गई…। ग्राम पंचायत पेटला डोंडरीपारा, सीतापुर सबीना, सिमरन, सुमन और संध्या चारों सगी बहनें हैं। पिता आनंद की एक्सीडेंट में मौत के सालभर बाद मां सुनीता ढुकू हो गई। तब बच्चों का भार बुजुर्ग दादी फूलमतिया और दादा रामेश्वर पर आ गया। आर्थिक हालत खराब होने से सिमरन को चाचा अपने साथ ले गए। सुमन बोली- मां याद आती है। भास्कर एक्सपर्ट – डॉ. मनोज साहू, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, मनोरोग विभाग, पं. जेएनएम मेडिकल कॉलेज प्र​​था गलत है, इससे बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित मां का बच्चों को छोड़कर जाना, बच्चों के शारीरिक-मानसिक दोनों विकास पर असर डालता है। बच्चे छोटे हैं तो लालन-पालन प्रभावित होगा। अगर, 6 से 12 साल के बीच हैं तो तनाव महसूस करेंगे। आदिवासियों में जब भी यह प्रथा शुरू हुई होगी, तब वे अपने समुदाय में सीमित रहे होंगे। मगर, आज वे आधुनिक समाज का हिस्सा हैं। बच्चे पढ़-लिख रहे हैं तो वे सबकुछ समझते हैं। निश्चित ही वे तनावग्रस्त होंगे। आज के समय में यह प्रथा गलत है। भास्कर को इस इन्वेस्टिगेशन के दौरान अनिल देवांगन, सुरेश राम तिर्की, मोहित किंडो, विजय रोशनी, अनिमा बेक का भी सहयोग मिला।

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