आदिवासी क्षेत्रों में दुष्कर्म पीड़िताओं का दर्द:दुष्कर्म से हुए बच्चों के पिता का नाम न होने से जन्म, जाति प्रमाण पत्र नहीं बन रहे; दाखिले में भी दिक्कत

छत्तीसगढ़ की नीरा भगत जब 11 साल की थी तो मानव तस्करी का शिकार होकर दिल्ली पहुंच गई। वहां 5 साल उससे दुष्कर्म हुआ। जब गर्भवती हुई तो कचरे की तरह फेंक दिया गया। वह किसी तरह अपने गांव पहुंची। घर वाले लौटने की आस छोड़ चुके थे। उसे दोबारा देख पिता ने गले लगा लिया लेकिन जब पता चला कि पेट से है तो वे सहम गए। गांव वालों से छुपाते कैसे। 6 महीने बाद नीरा ने एक बेटे के जन्म दिया। कमजोरी की वजह से नीरा बीमार रहने लगी। दो साल बाद चल बसी। बच्चा बड़ा हुआ तो स्कूल में दाखिले के समय पिता का नाम पूछा गया। 5 साल के बच्चे के दिमाग में यह बात घर कर गई-मेरा बाप कौन। नाना-नानी, मौसा-मौसी सबसे उसने पूछा, पर जवाब नहीं मिला। आज वह 19 साल का है। इंजीनियरिंग कर रहा है, लेकिन सवाल जस का तस है। मौसी ने अपने पति का नाम चुपके से देकर बचपन में उसका दाखिला करवा तो दिया लेकिन यह उसके लिए काल बन गया। मौसी के ससुराल वाले भी ये कहकर घर से निकाल रहे हैं कि ये जमीन में हिस्सा मांगेगा। नीरा जैसे देश में हजारों मामले में है। दुष्कर्म के बाद हुए बच्चे का पिता कौन होगा, इसका कानून में प्रावधान नहीं है। ऐसे बच्चे सामाजिक बहिष्कार झेलते हैं। ऐसे बच्चों को न तो जमीन का अधिकार है और न जाति का। आदिवासी महिलाओं के अधिकार के लिए लड़ने वाले पूर्व मंत्री गणेशराम भगत बताते हैं कि छत्तीसगढ़-झारखंड में ऐसी करीब 1400 रेप पीड़ित हैं। ये कोर्ट में बच्चों को लेकर पिता के नाम के लिए भटक रही हैं। ऐसे में इन बच्चों के जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहा है। यही दिक्कत जन्म प्रमाण पत्र बनने में रही है। तानों से बेटी को छोड़ा
20 साल की एकता खलखो की 5 साल की बेटी खुशबू है, जो नानी के पास रहती है। नानी बताती हैं कि 6 साल पहले पड़ोस के जॉन तिर्की ने बेटी से दुष्कर्म किया। पेट बढ़ने पर हमें पता चला। 2019 में एकता की बेटी हुई। वह उसका ध्यान नहीं रख पाती। कोर्ट जाते-जाते उसे बेटी से नफरत होने लगी। आज मैं उसे पाल रही हूं। पिता का नाम न होने से जाति प्रमाण पत्र नहीं बन रहा। एकता दूसरे गांव में रह रही है। दर्द भरी सच्चाई… आदिवासी क्षेत्रों में पिता से ही बच्चे को जाति मिलती है न्याय में देरी ने कराई बच्ची से नफरत तनीषा के पड़ोस में गांव के प्रभावशाली रामकृष्ण यादव के घर में 3 साल पहले करने जाती थी। तब उम्र सिर्फ 11 साल थी। यादव 65 साल का था। उनके बच्चे-बहू भी घर में ही रहते थे। तनीषा बताती है कि पहले वह मोबाइल में अश्लील फिल्में दिखाते, फिर मुझे कहीं भी टच करते। घर जाने से पहले धमकाते थे कि अगर बताया तो मारेंगे। मेरे इसी डर का वो फायदा उठाने लगा। तनीषा की मां बताती है कि उसका पेट बड़ा देखा तो सच सामने आया। 7वें महीने में खेत में बच्ची को जन्म दिया। जब हम उसके पास पहुंचे तो बच्ची पर च​ीटियां लगीं हुई थीं। तनीषा तब से सदमे में है। वह बच्ची को गोद में नहीं लेती। मैं व मेरी दूसरी बेटी ही उसे पाल पोस रहे हैं। यादव आज जेल में हैं। आंगनबाड़ी में उसका नाम लिखाने पहुंचे तो पिता का नाम पूछा तो हमने यादव का ही नाम लिखा दिया है। अब बच्ची बड़ी होगी तो उसकी जाति क्या होगी, यह हमारी चिंता है। नाजायज के ताने सुन स्कूल जाना छोड़ा जेरोम तिर्की की बेटी 5 साल की है। उसने स्कूल जाना छोड़ दिया है। जेरोम बताती हैं कि जब वे 15 साल की थी तभी घरवालों ने एक आदिवासी लड़के से शादी कर दी। वह रोज शराब पीकर पीटता था। 9 साल तक मैंने उसकी मार सही फिर मायके शिफ्ट हो गई। वहां नौकरी करते हुए मुझे महफूज आलम मिला। वह मुझसे 10 साल बड़ा था, लेकिन मेरा ध्यान रखता था। उसने मुझसे शादी का वादा किया और हर दिन घर आने लगा। मैं 2018 में प्रेगनेंट हो गई। मेरी बेटी हुई तो उसने अस्पताल में अपने नाम की जगह पिता में मेरे पहले पति का नाम लिखवा दिया। मैंने उससे शादी के लिए कहा तो उसने मुझे छोड़ दिया। मैंने पुलिस में केस किया है। अब वह मेरी बेटी को मारना चाहता है। बेटी को स्कूल में सब नाजायज कहते थे, इसलिए स्कूल जाना छोड़ दिया है। (दैनिक भास्कर ने सामाजिक जिम्मेदारी के तहत पीड़िताओं के नाम बदल दिए हैं। हमारे पास ऐसे और भी कई मामले में हैं।) भास्कर एक्सपर्ट – रिटा.जस्टिस वेद प्रकाश शर्मा व एड. राम प्रकाश पांडेय संपत्ति में हक पाने के लिए सिविल सूट करना होगा
संविधान में दुष्कर्म पीड़िता के बच्चे को उत्तराधिकार का हक है। पर दुष्कर्म पीड़िता के बच्चे को पहले दुष्कर्मी को जैविक पिता घोषित करना होगा। इसके लिए उसे कोर्ट में सिविल सूट करना होगा। डीएनए टेस्ट में अगर वह जैविक पिता साबित होता है, तब उसकी मृत्यु के बाद ही संपत्ति पर बच्चों का हक होगा। पिता जीते जी अगर चाहे तो संपत्ति पर अधिकार दे सकता है। विडंबना ये है कि 99% मामलों में सिविल सूट करने ही कोई नहीं आता। बाकी इतने लंबे चलते हैं कि फरियादी खुद ही हार मान जाता है। क्षतिपूर्ति मिलेगी, संविधान में पिता का प्रावधान नहीं रेप पीड़िता को क्षतिपूर्ति योजना में 6 लाख रु. तक कोर्ट देती है। संविधान में रेप विक्टिम का पिता घोषित करने का प्रावधान नहीं है। आदिवासी क्षेत्र में पिता से ही बच्चे की जाति तय होती है। मां के घरवाले जमीन न दें तो ऐसे बच्चे जमीन-जायदाद के हकदार नहीं।

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