राजधानी रायपुर में चलने वाली सिटी बसों को कमीशन के चक्कर में नगर निगम के अफसरों और बस ऑपरेटरों ने बेच खाया। साल 2008 से शहर में सिटी बस सेवा शुरू हुई। तब से अब तक तीन अलग-अलग योजनाओं में शहर के लिए करीब 45 करोड़ की लागत से 235 बसें खरीदी गईं। 17 साल में 199 बसें कंडम होकर खत्म हो गईं। हालात ये है कि 18 लाख की आबादी वाले रायपुर शहर में महज 36 सिटी बसें चल रही हैं। जबकि हर एक लाख की जनसंख्या पर 40 से 60 बसों का राष्ट्रीय औसत है। इस अनुपात में रायपुर की 18 लाख जनसंख्या के लिए कम से कम 720 बसों की जरूरत है। पिछले डेढ़ दशक में रायपुर में सिटी बस चलाने के तीन प्रयास हुए, लेकिन तीनों ही फेल साबित हुए। इतने सालों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का कोई सिस्टम ही डेवलप नहीं किया जा सका है। यही वजह है कि शहर में आज भी एक बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम नहीं बन पाया। आम लोग ऑटो और ई-रिक्शा पर निर्भर हैं। उनकी मजबूरी का फायदा उठाते हुए आटो-ई रिक्शा वाले मनमाना किराया वसूल रहे हैं। छोटी-छोटी दूरियों के लिए लोगों को 100 से डेढ़ सौ रुपए खर्च करना पड़ रहा है। शहर में सिटी बस सेवा फेल होने और इसे वर्तमान स्वरूप में पहुंचाने में बड़ा योगदान सिस्टम का है। बसों की खरीदी में कमीशन का बड़ा खेल चला। जो बसें शहर की जरूरत के लिए उपयोगी थीं, उन्हें ना खरीदकर ऐसी बसें खरीदी गईं जिन पर मोटा कमीशन मिला।
पहला: 2008 में आरसीबीएल से हुई शुरुआत
नगर निगम के अधीन रायपुर सिटी बस लिमिटेड का गठन 2008 में किया गया। करीब 6 करोड़ की लागत से 40 बसों के साथ सिटी बस सेवा शुरू हुई। इनमें 22 बड़ी और 18 छोटी बसें शामिल थीं। इसे आरसीबीएल और ट्रांसपोर्टर के बीच पीपीपी मॉडल पर चलाया गया। टेंडर कन्हैया ट्रांसपोर्ट को दिया गया। ट्रांसपोर्टर के बीच अनुबंध हुआ था कि विज्ञापन से होने वाली आय का 60% और पास से मिलने वाली आय का 80% ट्रांसपोर्टर को मिलेगा। विवाद के कारण अनुबंध रद्द कर 2012 में बसों का संचालन बंद कर दिया। दूसरा: रायपुर नगर निगम ट्रांसपोर्ट लिमिटेड
2013 में केंद्र की जवाहर लाल नेहरू नवीकरण योजना के तहत बस सेवा शुरू की गई। तब नगर निगम के अधीन आरएनटीएल का गठन किया गया। 17.50 करोड़ की लागत से 100 बसें खरीदी गईं। 10 साल के लिए संचालन का ठेका श्री दुर्गम्बा ट्रांसपोर्ट लिमिटेड को दिया गया। केंद्र की नई योजना आते तक इस प्लानिंग से सिटी बसें चलाई गईं। इस दौरान बसें कंडम होती रहीं और आपरेटर-अफसर लाल होते रहे। तीसरा: शहरी सार्वजनिक यातायात समिति
2016 में केंद्र की योजना शहरी सार्वजनिक यातायात समिति के तहत शहर में क्लस्टर वाइज बसें चलाने का प्लान बना। केंद्र से रायपुर शहर में 95 बसें चलनी थी। 65 बसें एसएमएल कंपनी से खरीदी गई। इस बीच कोविड का दौर आया। करीब डेढ़ साल तक बसें डिपो में खड़ी रहीं। आधी बसें कंडम हो गईं। 46 बसें चलने की हालत में मिलीं। इनमें से 36 ही सड़कों पर दौड़ रही हैं। जिन बसों को कंडम बताकर किनारे कर दिया गया था, उनके पार्ट्स को निकालकर दूसरी बसों में लगा दिया गया। सिटी बसें तभी सक्सेस होंगी जब आटो-ई रिक्शा मीटर पर चलें
सिटी बसों के पूर्व संचालक सलाम रिजवी ने कहा कि रायपुर शहर में सिटी बसें तभी सफल हो सकती हैं, जब ऑटो और ई-रिक्शा के शेयरिंग मॉडल को बंद किया जाए। उनमें मीटर सिस्टम चालू करना होगा। मीटर होने से ऑटो संचालक शेयरिंग नहीं चला पाएंगे। इसका फायदा लोगों को होगा। सिटी बसें आमतौर पर मुख्य सड़कों पर ही चलती हैं, क्योंकि शहर की भीतरी सड़कें संकरी हैं। लोग कालोनियों, बस्तियों या मोहल्लों से ऑटो और ई-रिक्शा से मुख्य सड़क तक आ सकेंगे। अभी ऑटो वाले कालोनियों से मुख्य सड़क तक आने का ही 100 और 150 रुपए ले लेते हैं। यदि वे मीटर पर चलेंगे तो लोगों को ज्यादा किराया नहीं देना पड़ेगा। मुख्य सड़क पर आकर वे बस ले सकते हैं। सीधी बात – विश्वदीप, कमिश्नर नगर निगम रायपुर पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बेहतर बनाने काम हो रहा सिटी बसें अब तक क्यों सफल नहीं रही?
-कोविड में सिटी बसें काफी दिनों तक डिपो में रखी रहीं। कई पार्ट्स खराब हो गए। चलाने के लिए कोई एजेंसी सामने नहीं आ रही थी। मेंटनेंस के लिए शासन से फंड जारी होने के बाद एजेंसी ने चलाने में हामी भरी।
ई-बसें कब तक आएंगी?
-थोड़ी देरी हो रही है। जल्द ही बसें आ जाएंगी।
सवाल : क्या 100 बसें काफी हैं?
-फिलहाल केंद्र से इतनी ही बसें मिली है। हम पब्लिक ट्रांसपोर्ट को और बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।


