आयड़ नदी का पानी खेती लायक भी नहीं:प्रदूषण नियंत्रण मंडल की जांच में सामने आया सच, यही से प्रतापनगर में पेयजल सप्लाई की योजना बनाई जा रही

उदयपुर में शहर के बीच से उदयसागर झील तक जाने वाली आयड़ नदी को लेकर हाल ही में हुई जांच ने सबको चौंका दिया है। राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल की जांच में पता चला कि नदी में बह रहा पानी औद्योगिक अपशिष्ट के मिक्स होने के चलते काफी जहरीला हो चुका है। यह पानी न पीने के लायक है, न खेती के। इस अपशिष्ट की शिकायत सीवरेज टास्क फोर्स के पूर्व सदस्य प्रो. महेश शर्मा ने उठाई थी। उनके कहने पर प्रदूषण नियंत्रण मंडल के क्षेत्रीय अधिकारी शरद सक्सेना ने टीम भेजकर जांच करवाई और करीब 55 टन स्लज भी हटवाया। यही दूषित पानी आगे चलकर उदयसागर झील में मिल रहा है। जबकि यही पर एक प्लांट लगाकर प्रतापनगर इलाके को पेयजल सप्लाई देने की योजना बनाई जा रही है। रिपोर्ट कहती है कि ऐसा हुआ तो पानी स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक होगा। जांच में पता चला कि आयड़ नदी में बह रहे अपशिष्ट की पीएच वैल्यू 2.53 है, जबकि पीने के पानी के लिए 6.5 से 8.5 तक सामान्य मानी जाती है। इसके साथ ही सीओडी 888, बीओडी 58, सस्पेंडेड सॉलिड 28 और ऑयल-ग्रीस की मात्रा 6 दर्ज की गई, जो सभी स्तर सुरक्षित सीमा से कहीं ऊपर हैं। प्रो. शर्मा ने सक्सेना से मुलाकात में कहा कि स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की रिपोर्ट में आयड़ सौंदर्यीकरण के साथ 20 एमएलडी का कॉमन एफ्लूएंट ट्रीटमेंट प्लांट लगाने का प्रस्ताव पहले से मौजूद है। उन्होंने यह रिपोर्ट उन्हें सौंप दी। इससे पहले वेश्कोस भी 20 एमएलडी का सीईटीपी लगाने का सुझाव दे चुका है। वहीं संभागीय आयुक्त भी शहर के लिए 60 एमएलडी की मौजूदा क्षमता को कम बताते हुए अतिरिक्त 20 एमएलडी का एसटीपी लगाने की बात कह चुके हैं। शर्मा का कहना है कि जब तक ये व्यवस्थाएं नहीं बनतीं, शहर को यह दूषित पानी नहीं दिया जाना चाहिए और बड़ी तालाब का पानी पीने के लिए इस्तेमाल किया जाए। कानपुर खेड़ा के एडवोकेट नवीन मेनारिया का कहना है कि सरकारी लापरवाही की वजह से आयड़ नदी की हालत पिछले दो दशक से लगातार बिगड़ती जा रही है। नदी किनारे जमीनें बंजर होती जा रही हैं, लेकिन किसानों की सुनने वाला कोई नहीं है। बार-बार इस बात को उठाने के बाद भी जिम्मेदार इस पर चुप रहते हैं। क्यों खतरनाक है यह पानी
1. पीएच 2.53: यह पानी बेहद अम्लीय है। ऐसा पानी पीने से पाचन तंत्र, दांत, गला और पेट को गंभीर नुकसान हो सकता है। नहाने पर भी त्वचा जल सकती है। पीने के पानी के लिए आदर्श पीएच रेंज लगभग 6.5 से 8.5 होती है किंतु पीएच 2.53 का मतलब है कि यह पानी अत्यधिक अम्लीय है। अत्यधिक अम्लीय पानी पीने से पाचन तंत्र, दांत और श्लेष्मा झिल्ली को गंभीर नुकसान ही सकता है। 2. सीओडी 888: इसका मतलब पानी में भारी मात्रा में जहरीले रसायन मौजूद हैं, जिन्हें साधारण ट्रीटमेंट से हटाना मुश्किल है। केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) 888 एमजी प्रति लीटर का मान बहुत ज्यादा प्रदूषण बताता है। पीने के पानी के लिए सीओडी का मान नगण्य या बहुत कम होना चाहिए। पानी में बड़ी मात्रा में गैर-बायोडिग्रेडेबल और जहरीले रासायनिक प्रदूषक मौजूद हैं, जो सामान्य जल उपचार विधियों द्वारा आसानी से नहीं हटेंगे और मानव स्वास्थ्य के लिए विषैले हो सकते हैं। 3. बीओडी 58: यह स्तर साफ पानी से लगभग 30 गुना ज्यादा है। इससे पानी में ऑक्सीजन खत्म हो जाती है, जिससे मछलियां और जलजीव मरने लगते हैं। बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) पानी में मौजूद जैविक पदार्थों को विघटित करने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा है। 58 एमली/एल बहुत अधिक है। पीने के पानी के लिए शून्य या 1-2 एमली/एल से कम होना चाहिए। साफ नदी में 2-5 एमली/एल होना चाहिए। यहां 30 गुना तक अधिक है जिससे पानी में ऑक्सीजन खत्म होता है जिससे मछली-पौधे मरते हैं।

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