आरएनटी मेडिकल कॉलेज:मेवाड़ के कानसिंह के फेफड़े हैदराबाद भेजे, मरीज को देंगे नए जीवन की सांसें

आरएनटी मेडिकल कॉलेज के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल (एमबी चिकित्सालय) में रविवार को दो साल में दूसरी बार सफलतापूर्वक अंगों को निकालने (ऑर्गन रिट्रीवल) की प्रक्रिया की गई। बेगूं (चित्तौड़गढ़) निवासी 53 वर्षीय कान सिंह, जो कई दिनों से वेंटिलेटर पर थे, उनके ब्रेन डेड घोषित होने पर परिजनों ने अंगदान का साहसिक निर्णय लिया। पत्नी और दोनों बेटों की सहमति के बाद विशेषज्ञों की टीम ने इस जटिल प्रक्रिया को अंजाम दिया। पिछले साल जनवरी में यहां पहली बार ऑर्गन रिट्रीवल हुआ था। हैदराबाद से आई टीम और स्थानीय चिकित्सकों के सहयोग से फेफड़ों व अन्य अंगों को संरक्षित किया गया। कान सिंह का यहां गत 14 दिसंबर से उपचार चल रहा था। तीन दिन पूर्व ब्रेन डेथ की पुष्टि हुई थी। इसके लिए न्यूरोलॉजी, यूरोलॉजी, निश्चेतना विभाग और अंग प्रत्यारोपण समन्वयकों की संयुक्त टीम ने जांच कर स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (सोटो) के निर्देश पर फेफड़ों को हैदराबाद भेजा। कॉलेज प्रधानाचार्य डॉ. विपिन माथुर ने बताया कि अस्पताल में किडनी प्रत्यारोपण की सुविधा जल्द शुरू होगी। जल्द ही अनुमति मिल जाएगी। अधिकांश निर्माण कार्य और तैयारी पूरी है। जनजाति बहुल इस क्षेत्र के मरीजों को अब प्रत्यारोपण के लिए बड़े शहरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। डॉ माथुर ने बताया कि कान सिंह के परिवार ने जो मानवीय संवेदना दिखाई है, वह पूरे समाज के लिए प्रेरणा है। यदि समाज का हर वर्ग अंगदान के प्रति जागरूक हो जाए, तो देश में अंगों की कमी से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है। अंगदान ही वास्तव में महादान है। 2021 में शुरू हुआ सेंटर, 2024 में पहला रिट्रीवल ऑर्गन रिट्रीवल सेंटर के पूर्व प्रभारी डॉ. सुनील गोखरू व वर्तमान प्रभारी डॉ. तरुण रलोत ने बताया कि आरएनटी मेडिकल कॉलेज में इस सेंटर की शुरुआत वर्ष 2020-21 में की गई थी। पहला रिट्रीवल जनवरी 2024 को हुआ था। ये मरीज एमपी का था। मरीज से लीवर व किडनी निकाला था। तब किम्स, हैदराबाद और जयपुर से एसएमएस मेडिकल कॉलेज, महात्मा गांधी हॉस्पिटल की टीम आई थी। फेफड़े के लिए किम्स की टीम ने इनकार किया था। उनका तर्क था कि मरीज लंबे समय से वेंटीलेटर पर था, इसलिए फेफड़े उपयुक्त नहीं पाए गए। महात्मा गांधी हॉस्पिटल की टीम उस मरीज का लीवर व किडनी लेकर गई थी। इसी दिन जयपुर एसएमएस की टीम एक किडनी लेकर लौटी थी। एयरपोर्ट तक ग्रीन कॉरिडोर, चार्टर से हैदराबाद भेजे
आरएनटी मेडिकल कॉलेज में उनकी देह पहुंची तो प्राचार्य डॉ. विपिन माथुर और अन्य चिकित्सक व परिजनों ने पार्थिव देह को नमन किया। प्रोसिजर के बाद निकाले गए अंगों को सजी-धजी एंबुलेंस से एयरपोर्ट के लिए ग्रीन कॉरिडोर से रवाना किया। चार्टर के जरिए फेफड़ हैदराबाद ले जाए गए। बेटा बोला- हमारे निर्णय से दूसरों को प्रेरणा मिलेगी मृतक कानसिंह हलवाई थे। उनके दो बेटे हैं। बड़े बेटे रजतसिंह ने कहा- अंगदान को लेकर उनसे पूछा गया तो उन्होंने सहमति दे दी। इससे दूसरों को भी प्रेरणा मिलेगी। इन अंगों से किसी को नया जीवन मिलेगा। कानसिंह की पत्नी सुनीता बोलीं कि उनके पिता का निधन भी फेफड़े खराब होने से हुआ था। इसलिए उन्होंने सोचा कि पति के अंगों से किसी को नया जीवन मिलेगा। … नेशनल सेंटर पर अलर्ट, वेटिंग लिस्ट से चुनाव मरीज ब्रेन डेथ है या नहीं, इसके लिए एप्निया टेस्ट किया जाता था। इसके बाद जयपुर को अलर्ट किया जाता है। सोटो (स्टेट ऑर्गेनाइजेशन ऑफ टीशू एंड ट्रांसप्लांट), रोटो- रीजनल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ टिश्यू एंड ट्रांसप्लांट- चंडीगढ़, क्योंकि उदयपुर नोर्थ इंडिया सेंटर का हिस्सा है, और नोटो (नेशनल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ टीशू एंड ट्रांसप्लांट) दिल्ली सफदरजंग को सूचना दी जाती है। वहां से वेटिंग के आधार पर मरीज व परिजन को सूचना दी जाती है। इसके लिए बकायदा अलर्ट जारी किया जाता है। वहां से मरीज का फॉलोअप लेकर समय तय करते हैं। इसके बाद संबंधित मरीज का हार्ट, किडनी, लीवर, फेफड़े निकाले जाते हैं। हार्ट के वाल्व, स्किन और आंखें भी ली जाती है। हार्ट को चार से छह घंटे में ट्रांसप्लांट करना जरूरी होता है।

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