ग्वालियर की हाई कोर्ट की डबल बेंच ने फैमिली कोर्ट के दिए गए उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक महिला को आर्य समाज के विवाह प्रमाणपत्र के आधार पर एक सेवानिवृत्त कंपनी कमांडर की पत्नी माना गया था। याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आर्य समाज का विवाह प्रमाण पत्र और कुछ फोटोग्राफ विवाह का प्रमाण नहीं माने जा सकते। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के अनुसार विवाह वैध तभी माना जाएगा, जब यह प्रमाणित हो कि आवश्यक वैदिक रीति-रिवाज और संस्कार पूरे किए गए हों। कोर्ट ने प्रस्तुत फोटो और साक्ष्यों का अवलोकन करते हुए कहा कि इनमें न तो कोई वैदिक रीतियां दिखाई देती हैं और न ही किसी विवाह रस्म का प्रमाण मिलता है। इसलिए इस विवाह को वैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने विवाह को अवैध घोषित करते हुए महिला के वैवाहिक अधिकारों पर रोक लगा दी। बुजुर्ग को साथ लेकर बनवाया था विवाह प्रमाणपत्र 75 वर्षीय बुजुर्ग ने अपने बेटे के विवाह के लिए एक वैवाहिक विज्ञापन प्रकाशित किया था। इसी दौरान उनकी बातचीत 45 वर्षीय महिला (रानी) से हुई। रानी बुजुर्ग को अपने साथ लेकर गई और 26 मार्च 2012 को लोहामंडी के आर्य समाज मंदिर में विवाह का प्रमाण पत्र बनवाया। दोनों ने एक-दूसरे को माला पहनाते हुए फोटो भी खिंचवाए। इसके बाद रानी ने बुजुर्ग की शासकीय सेवा पुस्तिका में स्वयं को उनकी पत्नी के रूप में दर्ज करवा लिया। बाद में किसी अन्य मामले में महिला की गिरफ्तारी हुई तो जांच के दौरान बुजुर्ग को पता चला कि सेवा पुस्तिका में उसका नाम आर्य समाज के प्रमाणपत्र के आधार पर दर्ज किया गया था। बुजुर्ग ने सेवा पुस्तिका से नाम हटाने के लिए आवेदन दिया, लेकिन प्रमाणपत्र बाधा बन रहा था। उन्होंने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की, परंतु फैमिली कोर्ट ने आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद बुजुर्ग ने हाईकोर्ट में अपील की और तर्क दिया कि, हाईकोर्ट ने इन तर्कों और साक्ष्यों को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने विवाह को अवैध क्यों माना?


