सांसारिक मार्ग को छोड़कर तीन बेटियों ने साध्वी बनने का निर्णय लिया है। तीनों ने संयम पथ पर आगे बढ़ने के लिए वैराग्य पथ को चुना। पढ़ाई में होशियार और परिवार की लाडली बेटियों ने इस मार्ग को अपनाने से पहले साध्वियों के साथ समय बिताया। 5 हजार किलोमीटर तक धार्मिक यात्राएं भी कीं। कोविड के समय में लगातार हो रही मौतों ने युवतियों के हृदय को परिवर्तित कर दिया। इस बीच साध्वियों ने संयम पथ के जरिए मोक्ष प्राप्ति का रास्ता बताया। तीनों 16 फरवरी को बाड़मेर में दीक्षा लेंगी। पढ़िए… वैराग्य पथ पर चलने का निर्णय लेने वाली युवतियों से भास्कर की बातचीत साक्षी बोली- इंजीनियर बनना था, लेकिन चुना संयम पथ
सांचौर के महावीर कॉलोनी दादावाड़ी निवासी साक्षी सिंघवी (27) पुत्री अशोक सिंघवी तीन भाई- बहनों में सबसे छोटी हैं। पिता की 2015 में हार्ट अटैक से मौत होने के बाद दोनों बड़े भाई घर की होलसेल जनरल स्टोर संभाल रहे हैं। साक्षी पढ़ाई में होशियार थीं। पिता इंजीनियर बनाना चाहते थे। उन्होंने भी इसके लिए पूरी तैयारी की। वर्ष 2020 में कोरोना के कारण पढ़ाई में गैप आया तो अपनी मां मंजू देवी के कहने पर साक्षी बेंगलूरू में हो रहे साध्वी दीप्ति प्रभा के चातुर्मास में उनसे मिलने गईं। वहां 10 दिनों तक रहीं। साध्वियों के जीवन, उनके धर्म और ध्यान से प्रभावित हुईं। उसे लगा कि सांसारिक जीवन व्यर्थ है। मोक्ष प्राप्ति का सही रास्ता तो धर्म-ध्यान और प्रभु की आराधना है। वे दस दिन की बजाए वहां सवा तीन महीना रहीं। वापस घर लौटीं और वर्ष 2021 में बीएससी की पढ़ाई पूरी की। अब उनका मन पढ़ाई से ज्यादा धर्म और ध्यान में लग रहा था। उन्होंने तय किया कि सांसारिक जीवन त्याग कर साध्वी बनना है। करीब 8 महीने पहले मां मंजूदेवी को बताया, लेकिन वे राजी नहीं हुईं। मां बोलीं- रास्ता काफी कठिन है। उन्होंने हार नहीं मानी और मां व दोनों भाइयों को मना लिया। साक्षी ने पैदल 2 हजार किलोमीटर से ज्यादा का विहार भी किया, जिसमें गिरनार नवाणु यात्रा भी शामिल है। भावना बोलीं- रेस्टारेंट- मन में वैराग्य जागा तो दीक्षा ली
बाड़मेर की रहने वाली भावना (30) पुत्री सोहनलाल संखलेचा ने बताया- शुरू से धार्मिक प्रवृत्ति की रही हूं। बाहर घूमना, रेस्टोरेंट, होटल, थिएटर जाना कभी पसंद नहीं रहा। जब होश संभाला तो स्थानक जाना शुरू किया। वहां संतों के प्रवचन सुनना अच्छा लगता था। मन में वैराग्य भाव जाग रहा था और जब साध्वी नित्यप्रभा और विद्युतप्रभा से मिली तो वैराग्य लेने का भाव और मजबूत हो गया। भावना ने बताया- करीब पांच साल पहले हिम्मत कर घर पर अपनी इच्छा जाहिर कर दी। मां प्यारीदेवी राजी हो गई, लेकिन पिता सोहनलाल ने मना कर दिया। मेरी इच्छा देखने के बाद वे भी मान गए। करीब चार साल तक गुरुकुलवास में रही। साध्वियों के साथ करीब 5 हजार किलोमीटर तक पैदल धार्मिक यात्रा की। इनमें नवाणु यात्रा पालीताणा, गिरनार भी शामिल है। BA तक की पढ़ाई की है। पिता शेयर मार्केट में ब्रोकर है। चार भाई बहनों में भावना तीसरे नंबर की है। दो भाई और दो बहन हैं। साध्वियों के साथ रहने पर ऐसा लगा कि सांसारिक जीवन दिखावे का है। मोक्ष के लिए मन को संयम पथ पर अग्रसर होना ही होगा, इसलिए दीक्षा लेने की ठानी। निशा ने कहा- लेक्चरर बनना था, लेकिन अब साध्वी बनूंगी
राजस्थान के बाड़मेर हाल डीसा (गुजरात) निवासी निशा बोथरा (25) की कहानी भी साक्षी जैसी ही है। बीकॉम कर चुकी निशा लेक्चरर बनना चाहती थीं। वर्ष 2020 में कोविड समय के दौरान साध्वी विद्युतप्रभा के संपर्क में आईं, तो हृदय परिवर्तन हो गया। प्रवचन सुनने के बाद लगा कि कोविड में जिस तरह लोग मर रहे हैं, एक दिन वह भी इस दुनिया से चली जाएंगी। लेकिन मोक्ष प्राप्त करना है और आंतरिक खुशी चाहिए तो संयम पथ ही सबसे अच्छा है। करीब डेढ़ साल तक साध्वी विद्युतप्रभा और साध्वी दीप्तिप्रभा के पास आती-जाती रहीं। उनके साथ कई धार्मिक यात्रा पैदल की। जब लगा कि वह संयम पथ पर चल सकती हैं तो घर पर मम्मी को बताया। पहले तो वे राजी नहीं हुई, लेकिन बाद में मान गई। पिता कपड़े के कमीशन एजेंट हैं। चार भाई- बहनों में निशा दूसरे नंबर की है। परिवार में तीन बहनें और एक भाई है। साधु जीवन में खोने को कुछ नहीं
साध्वी हेमचरणरज अर्हमनिधी ने बताया- आज की पढ़ी-लिखी लड़कियां बहुत समझदार होती हैं। जब उन्हें जीवन का लक्ष्य मिलता है तो वे खुशी प्राप्त करती हैं, लेकिन ये खुशियां हमेशा नहीं रहती है। हम इस जीवन में संयोग और वियोग की प्रक्रिया को नियति मानकर हमेशा आगे बढ़ते हैं। इसी कारण आज की लड़कियां साधु जीवन को चुन रही हैं।


