इंदौर के गीता भवन में भागवत ज्ञान यज्ञ:भगवान के प्रति कर्मों के समर्पण बिना जीवन में पवित्रता नहीं आ पाएगी- स्वामी भास्करानंद

परमात्मा का दूसरा नाम आनंद है। परमात्मा के स्मरण मात्र से ही आनंद की अनुभूति होती है। भगवान की लीलाओं में प्राणी मात्र के प्रति कल्याण का ही भाव होता है। भगवान की लीलाओं को समझ पाना स्वयं ब्रह्माजी के लिए भी मुश्किल काम था फिर हम तो साधारण मानव है। संसार की सभी गतिविधियां हमें बाहर से जोड़ती है, लेकिन हमारे धर्मशास्त्र हमें अंदर से जोड़ते हैं। खुद से खुद को जोड़ने का काम करते हैं हमारे धर्म ग्रंथ। मन, वचन और कर्म से भगवान के प्रति अपने कर्मों का समर्पण कर देंगे तो हमारे जीवन में भी पवित्रता और निर्मलता आ जाएगी। गीता भवन सत्संग सभागृह में गोयल परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद भागवत ज्ञान यज्ञ में पांचवे दिन श्रीधाम वृंदावन के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी भास्करानंद ने श्रीकृष्ण जन्मोत्सव प्रसंग पर उक्त प्रेरक विचार व्यक्त किए। भगवान की लीलाओं को हम कभी नहीं समझ सकते कथा में भगवान की बाल लीलाओं का भावपूर्ण चित्रण करते हुए महामंडलेश्वरजी ने कहा कि भगवान की लीलाओं को हम मनुष्य के रूप में कभी नहीं समझ सकते। उनकी प्रत्येक लीला में प्राणी मात्र के प्रति सदभाव और कल्याण का भाव होता है। वे जो भी कुछ करते हैं हमारे उद्धार के लिए ही करते हैं। इस दौरान भगवान गोवर्धन नाथ को 56 भोग भी समर्पित किए गए। कथा शुभारंभ के पूर्व आयोजन समिति की ओर से श्रद्धालुओं ने विद्वान वक्ता एवं व्यासपीठ का पूजन किया। संगीतमय कथा के दौरान साध्वी कृष्णानंद द्वारा प्रस्तुत मधुर भजन भी भक्तों को आल्हादित बनाए रहे। शनिवार, 21 दिसंबर को कथा में रुक्मणी विवाह का उत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। उत्सव के लिए व्यापक तैयारियां की गई है। समापन 22 दिसंबर को सायं 4 से 7 बजे तक कथा के बाद होगा। भागवत में हमारे जीवन का ही हिस्सा उन्होंने कहा कि भागवत में जो कुछ भी है वह सब हमारे जीवन का ही हिस्सा है। भागवत कथा तो है ही, हम सबके जीवन की व्यथा भी है। जैसे भगवान के जीवन में अविद्या रूपी पूतना आई, वैसे ही हमारे जीवन में भी पूतना और अघासुर, बकासुर जैसी दुष्प्रवृत्तियां आती रहती है। अविद्या के नाश होने पर ही हमारे जीवन से दुखों का खात्मा हो सकता है। भागवत के दशम स्कंध के नौवें अध्याय में भगवान की बाल लीलाओं का वर्णन किया गया है। मन, वचन और कर्म से हम जब तक भगवान के प्रति समर्पित नहीं होंगे, हमारे जीवन में पवित्रता और निर्मलता नहीं आ पाएगी। इसके बिना जीवन सार्थक नहीं हो सकता।

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