इंदौर में हाईकोर्ट के बीआरटीएस की एक साइड को पूरी तरह हटाने की टिप्पणी करने के बावजूद नगर निगम कार्रवाई में ढिलाई बरत रहा है। कोर्ट ने नगर निगम को 15 दिन का समय दिया है, लेकिन अब तक सिर्फ 300 मीटर हिस्सा ही पूरी तरह तोड़ा जा सका है। जिस कंपनी को निगम ने तोड़फोड़ का ठेका दिया था, उसी कंपनी ने यह काम आगे कबाड़ी को सौंप दिया है। इंदौर के बीआरटीएस पर कुल 19 बस स्टॉप हैं, जिनमें से अब तक केवल एक ही बस स्टॉप पूरी तरह हट पाया है। एक बस स्टॉप तोड़ने में 4–5 दिन लग रहे हैं। शिवाजी वाटिका से देवास नाका तक लगभग 7 किलोमीटर बीआरटीएस हिस्सा अभी तक नहीं तोड़ा गया। इसी हिस्से के अंदर पलासिया, गीता भवन, एलआईजी, रसोमा, विजयनगर और सत्य सांई चौराहों पर सबसे ज्यादा जाम लगता है। कई चौराहे बॉटलनेक बने हुए हैं। पहले जानिए…कितना हिस्सा टूटा 300 मीटर हिस्सा पूरी तरह हटाया गया जीपीओ चौराहे से भाजपा कार्यालय तक का बीआरटीएस हिस्सा पूरी तरह तोड़ा जा चुका है। यहां टेम्परेरी बैरिकेड भी लगा दिए गए हैं। 5 किमी का हिस्सा एक साइड से तोड़ा गया राजीव गांधी चौराहे से भंवरकुआं, नौलखा, इंदिरा प्रतिमा और जीपीओ तक की एक साइड की रेलिंग हटाई जा चुकी है। लेकिन बीच के बस स्टॉप अभी नहीं तोड़े गए हैं। दूसरी साइड की रैलिंग हटाने का काम 20 दिन बाद शुरू होने की संभावना है। एक बस स्टॉप तोड़ा गया जीपीओ चौराहे का बस स्टॉप आधा तोड़ा गया है और काम रोक दिया गया है। वहीं शिवाजी वाटिका का बस स्टॉप पूरी तरह तोड़ा जा चुका है। कंपनी का दावा- 4–5 दिन में एक साइड तोड़ देंगे बीआरटीएस को तोड़ने वाली कंपनी के कर्मचारियों का दावा है कि 11.5 किमी लंबे बीआरटीएस की एक साइड को 4 से 5 दिन में पूरी तरह हटा दिया जाएगा। बीआरटीएस की एक साइड तोड़ने वाले कर्मचारी रऊफ भाई ने बताया कि राजीव गांधी चौराहे से शिवाजी वाटिका तक एक साइड पूरी तरह हटा दी गई है। ट्रैफिक के कारण काम काफी धीमी गति से चल रहा है, फिर भी टीम दिन–रात काम कर रही है। उन्होंने कहा कि बस स्टॉप तोड़ने का काम बाद में किया जाएगा, क्योंकि निगम ने पहले जाली (रेलिंग) हटाने का काम सौंपा है। रऊफ ने ऑफ द रिकॉर्ड बताया कि 4 से 5 दिन में एक साइड पूरी तरह तोड़ने की कोशिश की जाएगी, लेकिन यह कब तक पूरी तरह हट पाएगा, यह कहना अभी मुश्किल है। कबाड़ी को सौंपा गया काम निगम सूत्रों के मुताबिक, बीआरटीएस हटाने का टेंडर राजगढ़ के ठेकेदार दिनेश यादव को दिया गया था, लेकिन उसने काम करने से मना कर दिया। समझाने के बाद उसने इंदौर के एक सहयोगी को ठेका दिया, जिसने बाद में एक कबाड़ी को यह काम सौंप दिया। बीआरटीएस के 19 बस स्टॉप हटाए जाने हैं, लेकिन अब तक एक भी पूरी तरह नहीं हट सका है। रेलिंग और बीम हटाने का काम तो जल्दी होगा, पर सबसे ज्यादा समय बस स्टॉप हटाने में लगेगा, क्योंकि इसके बाद सेंटर डिवाइडर बनाने का काम शुरू होगा। इसके लिए निगम ने तीन अलग-अलग एजेंसियों को टेंडर दिए हैं। पिछले 6 महीने टेंडर प्रक्रिया और ठेकेदारों की तलाश में ही बीत गए, और अब भी तुड़ाई की रफ्तार सुस्त है। जानिए…BRTS रेलिंग हटाने के आदेश के बाद क्या हुआ एक्सपर्ट बोले- पहले सिस्टम बदलना पड़ेगा बीआरटीएस जितनी मुश्किलों से बना था, उससे ज्यादा परेशानी अब तोड़ने में आ रही है। ट्रैफिक विशेषज्ञ प्रफुल्ल जोशी के अनुसार, बीआरटीएस का अपना सिस्टम है, इसलिए इसे हटाने के साथ वैकल्पिक व्यवस्था भी बनानी होगी। कंट्रोल रूम से चल रहा पूरा ट्रैफिक सिस्टम बदलना पड़ेगा। रातोरात सिर्फ रेलिंग तोड़ने से समस्या हल नहीं होगी। इन 15 चौराहों पर मिलेगा ट्रैफिक को फायदा बीआरटीएस हटने पर चिड़ियाघर से जीपीओ, गीता भवन, पलासिया, इंडस्ट्री हाउस, एलआईजी, रसोमा सहित 15 चौराहों–तिराहों पर ट्रैफिक सुचारू होगा। रोज 3 लाख से अधिक वाहन इन चौराहों से गुजरते हैं। पीक ऑवर में कई बार तीन सिग्नल ग्रीन होने के बाद ही वाहन निकल पाते हैं। रेलिंग हटने पर 24–30 मीटर अतिरिक्त जगह मिलेगी। 1.53 लाख किलो स्टील निकलेगा, यह 46 लाख रुपए में बिकेगा नगर निगम के सर्वे के अनुसार, कॉरिडोर में आरसीसी बीम की लंबाई 10,475 मीटर, चौड़ाई 0.35 मीटर और गहराई 0.30 मीटर है। इसका घनफल 2,199 घनमीटर होता है। इस बीम को हटाने पर 17.29 लाख रुपए खर्च होंगे। इसी तरह 18 बस शेल्टर होम को हटाने पर 8.20 लाख रुपए का खर्च आएगा। छोटे आरसीसी निर्माण 32,207 घनमीटर क्षेत्र में फैले हैं, जबकि स्क्रब्स 40,105 घनमीटर में बने हैं। इन्हें हटाने पर 3.25 लाख रुपए का खर्च आएगा। स्टील रेलिंग 3.67 लाख वर्गमीटर क्षेत्र में लगी है, जिसे निकालने पर भी लागत आएगी। बीआरटीएस तोड़ने पर कुल खर्च 34.70 लाख रुपए अनुमानित है। कॉरिडोर से 1.53 लाख किलो स्टील निकलेगा, जो 30 रुपए प्रति किलो की दर से 46 लाख रुपए में बिकेगा। वहीं 10,000 मीटर लंबी रेलिंग और 90% ए-श्रेणी का स्क्रैप 45 रुपए प्रति किलो की दर से बिकेगा। इससे 2.31 करोड़ रुपए की आय होने का अनुमान है। कुल मिलाकर नगर निगम को लगभग 3.37 करोड़ रुपए की कमाई हो सकेगी। देश का दूसरा सबसे अच्छा बीआरटीएस: फिर भी क्यों टूटा? अब जानिए इंदौर बीआरटीएस का इतिहास- कैसे बना 11 किमी कॉरिडोर देश में बीआरटीएस का मॉडल पटाया सिटी से प्रेरित माना जाता है। भारत में सबसे पहले अहमदाबाद में बीआरटीएस बनाया गया था। इंदौर में इसकी जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि पेट्रोल–डीजल के बढ़ते दामों के बीच पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देकर निजी वाहनों की संख्या कम करना और प्रदूषण स्तर घटाना जरूरी हो गया था। इसी उद्देश्य से तत्कालीन कलेक्टर विवेक अग्रवाल ने इस परियोजना पर काम शुरू किया। सबसे पहला सवाल था- इसे बनाएगा कौन? क्योंकि उस समय इंदौर नगर निगम की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उसी दौरान केंद्र सरकार की जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूवल मिशन (JNNURM) योजना आई, जिसके तहत बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर वाले 63 शहरों को अनुदान देने के लिए चुना गया था। इनमें इंदौर भी शामिल था। इस परियोजना के तहत इंदौर बीआरटीएस का प्रस्ताव इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) के माध्यम से तैयार कराया गया और राज्य सरकार के जरिए केंद्र को भेजा गया। केंद्र से धन स्वीकृत होने पर कलेक्टर विवेक अग्रवाल ने आईडीए को बीआरटीएस निर्माण का कार्य शुरू करने को कहा। दूसरा बड़ा सवाल था- बसें कहां से आएंगी? बीआरटीएस संचालन के लिए बसें आवश्यक थीं, लेकिन राज्य और केंद्र सरकार दोनों ने बसें उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया। इसके बाद विवेक अग्रवाल जीरो फायनेंस बस मॉडल लेकर आए और एआईसीटीएसएल का गठन किया गया। यह ऐसा मॉडल था जिसमें प्रशासन या शासन ने अपनी जेब से एक रुपया भी नहीं लगाया और अलग-अलग निजी ऑपरेटरों के माध्यम से बसें शुरू की गईं। इस मॉडल के तहत सिस्टम सरकारी रहा, लेकिन बसें निजी ऑपरेटरों द्वारा संचालित की गईं।


