ग्राम धरदेई में रविवार की रात दंपति ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। खुदकुशी का कारण एक साल पहले हादसे में इकलौते बेटे आदित्य (24) की मौत सामने आई है। उनके सुसाइड नोट के अनुसार हादसे के दिन उन्होंने आदित्य को मंदिर निर्माण संबंधी काम के लिए धौराभाठा भेजा था, जबकि वह जाना नहीं चाहता था और उन्होंने धर्म का काम है कहकर जबरदस्ती भेजा था। मस्तूरी थाना क्षेत्र में हुए हादसे में मौत के बाद वे इसे अपनी सबसे बड़ी भूल मानते थे। उनके लिखे सुसाइड नोट के अनुसार उनका बेटा उनके लिए सब कुछ था। उसकी मौत के बाद उनका जीवन खत्म-सा हो गया है। उसके गम में उनका शरीर, मन, बुद्धि, सब धीरे-धीरे शिथिल होता जा रहा था। इसी निराशा भरी जिंदगी से मुक्ति के लिए उन्होंने आत्महत्या कर ली। हालांकि ग्रामीणों के अनुसार उन्होंने मोक्ष की आस में खुदकुशी से पहले महाशिवरात्रि का उपवास रखा था और पूजा भी की थी। सोमवार की सुबह जब पुलिस पहुंची, तो उन्होंने लाशों को कब्जे में लिया। मानसिक अवसाद बना दंपती की खुदकुशी का कारण मैं कृष्णकुमार, अपनी धर्मपत्नी रमादेवी के साथ यह पत्र पूर्ण होश, विवेक और शांतचित्त अवस्था में लिख रहा हूं। हमारा पुत्र आदित्य हमारे जीवन का आधार, हमारा संसार और हमारी सबसे बड़ी आशा था। वह केवल एक सुपुत्र ही नहीं, बल्कि हमारा मित्र, हमारा सहारा और पिता समान हमारी देखभाल करने वाला था। उसके रहते हमें किसी बात की चिंता नहीं रहती थी। वह हर जिम्मेदारी स्वयं संभाल लेता और अधिक से अधिक समय हमारे साथ बिताता। उसका पहला उद्देश्य हमें खुश रखना था। सच में, वह हमारे लिए ईश्वर का वरदान था। एक दिन वह भगवान के कार्य से संबंधित मंदिर निर्माण के नक्शों के प्रचार के लिए धौराभाठा गांव चंदन बाबा के साथ गया। वह जाना नहीं चाहता था पर हमने ही उसे यह कहकर भेज दिया कि यह भगवान का कार्य है। हमें क्या पता था कि यह निर्णय हमारे जीवन की सबसे बड़ी भूल बन जाएगा। उसके जाने के बाद हमारा जीवन जैसे समाप्त हो गया। हम जी तो रहे हैं, पर जीवन शेष नहीं रहा। शरीर, मन और बुद्धि सब शिथिल हो गए। हर दिन, हर पल उसकी कमी असहनीय पीड़ा देती रही। बीते एक वर्ष हमारे लिए अत्यंत दुख, अशांति और व्याकुलता से भरा रहा। संसार की इच्छाएं, कामनाएं और मोह धीरे-धीरे समाप्त होते गए। धरदेई के कृष्ण कुमार पटेल और रमाबाई पटेल की आत्महत्या के पीछे गंभीर मानसिक और भावनात्मक कारक काम कर रहे थे। उनके एकमात्र बेटे आदित्य की अचानक मृत्यु ने उन्हें गहरे सदमे में डाल दिया, जिसे जटिल शोक विकार कहा जा सकता है, जिसमें दर्द सालों तक कम नहीं होता और व्यक्ति लगातार उसी घटना के बारे में सोचता है। इस लंबे शोक के कारण दोनों में मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर के लक्षण भी उभर सकते थे। इसमें आत्महत्या का विचार भी शामिल है। आत्महत्या रोकी जा सकती थी, अगर उन्हें समय पर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सहारा मिलता। बेटे की अचानक मृत्यु के बाद काउंसलिंग और थेरेपी से जटिल शोक और अवसाद के लक्षण कम किए जा सकते थे। परिवार, मित्र और समुदाय का निरंतर साथ, अकेलेपन को कम करने और भावनात्मक सहारा देने में मदद करता। आत्महत्या के संकेत जैसे लगातार उदासी, जीवन में रुचि न होना, को गंभीरता से लेना जरूरी था। घर में आत्महत्या के साधनों तक आसान पहुंच सीमित करना और समय पर दवा या मनोचिकित्सकीय इलाज शुरू करना भी जीवन बचाने में महत्वपूर्ण था। डॉ. भोगेंद्र डनसेना, मनोविज्ञानी, जिला अस्पताल जांजगीर-चांपा


