ईश्वर की भक्ति करने के लिए कोई उम्र तय नहीं होती: पं. दुबे

भास्कर न्यूज | पाली ग्राम पंचायत ढुकुपथरा के आश्रितगांव पंडरापथरा में श्रीमद् भागवत कथा महापुराण का आयोजन किया गया। कथा का शुभारंभ भव्य कलश यात्रा के साथ हुई थी। कथा व्यास पंडित राम कुमार दुबे सीस वाले ने भागवत की संपूर्ण कथा प्रसंग का रसपान कराया। इस संगीतमय कथा आयोजन के पाठ परायण कर्ता पंडित पंकज शुक्ला और आचार्य पंडित आयुष दुबे हैं। कथा में व्यास पीठ से पं. दुबे ने भक्त प्रह्लाद चरित्र, भरत चरित्र, पृथु चरित्र व हिरणकश्यप बध, नरसिंह अवतार व समुद्र मंथन का वर्णन किया। कथावाचक ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का केंद्र है आनंद। आनंद की तल्लीनता में पाप का स्पर्श भी नहीं हो पाता। भागवत कथा एक ऐसा अमृत है कि इसका जितना भी पान किया जाए, मन तृप्त नहीं होता है। उन्होंने कहा कि हिरणकश्यप नामक दैत्य ने घोर तप किया, तप से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी प्रकट हुए व कहा कि मांगों जो मांगना है। यह सुनकर हिरण्यकश्यप ने अपनी आंखें खोली और ब्रह्माजी को अपने समक्ष खड़ा देखकर कहा-प्रभु मुझे केवल यही वर चाहिए कि मैं न दिन में मरूं, न रात को, न अंदर, न बाहर, न कोई हथियार काट सके, न आग जला सके, न ही मैं पानी में डूबकर मरूं, सदैव जीवित रहूं। उन्होंने उसे वरदान दिया। हिरणकश्यप के पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे। हिरणकश्यप भागवत विष्णु को शत्रु मानते थे। उन्होंने अपने पुत्र को मारने के लिए तलवार उठाई थी कि खंभा फट गया। उस खंभे में से विष्णु भगवान नरसिंह का रूप धारण करके प्रगट हुए और अत्याचारी हिरण्यकश्यप को पकड़कर उदर चीर कर वध कर किया। उन्होंने बताया कि बहुत कम उम्र में भक्त ध्रुव प्रह्लाद आदि ने अपनी भक्ति से ईश्वर को प्राप्त कर लिया था। ईश्वर की प्राप्ति और भक्ति के लिए कोई उम्र नहीं होती है।

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