झारखंड में पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) क्षेत्र के हाथियों के एकदंत होने का रहस्य खुलने वाला है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट की देखरेख में करीब 4 माह तक हाथियों की गणना हुई। इनकी प्रकृति और स्वभाव पर रिसर्च किया गया। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट अपनी रिसर्च का जल्द खुलासा करनेवाला है। पीटीआर के निदेशक कुमार आशुतोष ने बताया कि इस वन क्षेत्र में पहले हाथियों की संख्या करीब 175 थी। अब 225 के पार पहुंच चुकी है। यहां के हाथियों के जेनेटिक्स पर भी अध्ययन किया गया है। यह जानने की कोशिश की गई कि इस क्षेत्र के हाथी एकदंत क्यों होते हैं? उनका आचरण- व्यवहार कैसा है? रिसर्च रिपोर्ट वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट जल्द ही जारी करेगा। पढ़िए रिपोर्ट… एक्सपर्ट से जानें… पलामू के हाथियों का स्वभाव और उसके गुण झारखंड में दो तरह के हाथियों का समूह है। सरगुजा और मयूरभंजी हाथी। पलामू टाइगर रिजर्व में सरगुजा हाथी पाए जाते हैं। दोनों के शारीरिक बनावट में भिन्नता नहीं होती, लेकिन गुण व स्वभाव मयूरभंजी हाथियों से अलग होता है। पलामू के हाथी हिंसक या आक्रामक नहीं होते हैं। परिस्थितियों के अनुसार इनको गुस्सा आता भी है, तो ज्यादा उत्पात नहीं मचाते। मानवीय व्यवहार को बहुत दिनों तक याद रखते हैं और उसके अनुरूप प्रतिक्रिया करते हैं। इंसान की तरह जानवरों में भी अनुवांशिक गुण पाए जाते हैं। पलामू के ज्यादातर हाथियों में एक दांत पाया जाता है। इसके पीछे का कारण भी रोचक है। साल 1820 में अमर सिंह सरगुजा के राजा बने थे। 1824 में उन्हें महाराजा की उपाधि मिली थी। वे पशु प्रेमी थे। उनके राज में 361 पालतू हाथी थे। इसमें अधिकतर एक दांत वाले नर हाथी थे। छत्तीसगढ़ कॉरिडोर से जुड़ा है पलामू टाइगर रिजर्व पलामू टाइगर रिजर्व छत्तीसगढ़ कॉरिडोर से जुड़ा हुआ है। छत्तीसगढ़ से बड़ी संख्या में हाथी पलामू टाइगर रिजर्व में दाखिल होते हैं। झारखंड के पलामू, गढ़वा, लातेहार, गुमला, लोहरदगा, सिमडेगा, खूंटी, चाईबासा के इलाके में सबसे अधिक हाथियों की गतिविधि है। सिंहभूम का इलाका एलिफेंट रिजर्व एरिया कहा जाता है। इस क्षेत्र के हाथी प. बंगाल और ओडिशा तक भ्रमणशील रहते हैं।


