एमपी में कंपनी को बिना टेंडर 159 करोड़ का भुगतान:राशन दुकानों की मशीनों पर हर महीने 1254 रुपए खर्च, 5 साल से जारी ‘मेहरबानी’

मध्य प्रदेश में गरीबों तक पहुंचने वाले राशन को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए शुरू की गई एक महत्वाकांक्षी योजना, अब खुद सवालों के घेरे में है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में पारदर्शिता लाने के लिए हर राशन की दुकान पर लगाई गई पॉइंट ऑफ सेल (POS) मशीनें, सरकारी अधिकारियों और एक निजी कंपनी के बीच कथित साठगांठ से कमाई का जरिया बन गई हैं। एक ही कंपनी, मैसर्स लिंकवेल टेली सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड, पर अधिकारी इस कदर मेहरबान हुए कि न केवल उसे पूरे प्रदेश का ठेका सौंप दिया गया, बल्कि एग्रीमेंट समाप्त होने के 5 साल बाद भी लगातार उसे सेवा विस्तार दिया जा रहा है। इस अवधि में कंपनी को मशीनों के रखरखाव के नाम पर 191 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान किया जा चुका है, जबकि आरोप है कि यह पेमेंट गलत तरीके से और ज्यादा दरों पर किया गया है। ऐसे शुरू हुई कहानी: 2015 का टेंडर और दो कंपनियों की एंट्री
मामले की शुरुआत 2015 में हुई, जब मध्य प्रदेश सरकार ने राशन वितरण प्रणाली को आधुनिक और विश्वसनीय बनाने का फैसला किया। इसके लिए बॉयोमेट्रिक पहचान को अनिवार्य किया गया, ताकि सही हितग्राही को ही उसका हक मिल सके। मध्य प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (MPSEDC) ने खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की ओर से प्रदेश भर की राशन दुकानों पर POS मशीनें लगाने और उनके रखरखाव के लिए एक टेंडर जारी किया। यह टेंडर ‘बिल्ड-ऑन-ऑपरेट’ मॉडल पर आधारित था, जिसका मतलब था कि चुनी गई कंपनियों को खुद मशीनें खरीदकर लगानी थीं और 5 साल के एग्रीमेंट के दौरान उनके संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी भी उन्हीं की थी। इस 5 साल की अवधि में होने वाले भुगतान में मशीनों की लागत, स्थापना व्यय और रखरखाव का खर्च शामिल था। यह काम दो कंपनियों मैसर्स लिंकवेल टेलीसिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड और डीएसके को मिला, जिन्होंने प्रदेश को आधे-आधे हिस्से में बांटकर काम शुरू किया। घोटाले के बाद एक कंपनी का एकाधिकार
सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन 2019 में इस व्यवस्था में एक बड़ी सेंधमारी सामने आई। राजधानी भोपाल में एक ही बॉयोमेट्रिक पहचान पर कई लोगों को राशन बांटने का फर्जीवाड़ा उजागर हुआ। यह स्पष्ट हो गया कि तकनीक को भी धोखा दिया जा सकता है। इस गड़बड़ी के सामने आने के बाद विभाग ने सख्त कार्रवाई करते हुए डीएसके कंपनी का एग्रीमेंट रद्द कर दिया और उसे ब्लैक लिस्ट कर दिया। यहां से कहानी में एक नया मोड़ आया। नियमों के अनुसार, डीएसके का काम छीनने के बाद खाली हुए आधे प्रदेश के लिए एक नया टेंडर जारी किया जाना चाहिए था। लेकिन अधिकारियों ने ऐसा करने के बजाय, डीएसके का पूरा काम बिना किसी नए टेंडर के सीधे लिंकवेल टेलीसिस्टम्स को सौंप दिया। इस तरह, जो कंपनी पहले आधे प्रदेश में काम कर रही थी, वह रातों-रात पूरे मध्य प्रदेश की मालिक बन गई। इस निर्णय पर सफाई देते हुए तत्कालीन उप सचिव बी. के. चंदेल ने दलील दी थी, “केंद्र सरकार के स्पष्ट निर्देश हैं कि राशन का वितरण बॉयोमेट्रिक पहचान सत्यापित करने के बाद ही किया जाए। यदि इसके बिना राशन बांटा जाता है, तो केंद्र उसकी प्रतिपूर्ति नहीं करता। साथ ही, गरीबों के लिए राशन का वितरण एक दिन भी नहीं रोका जा सकता। इसलिए, उस समय जो मौजूदा विकल्प संभव था, उसे अपनाया गया।” एक लाइन का सहारा, 6 बार एक्सटेंशन
अधिकारियों की यह दलील शायद उस तात्कालिक स्थिति के लिए जायज हो सकती थी, लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह पूरी प्रक्रिया को संदिग्ध बनाता है। 2020 में लिंकवेल कंपनी का 5 साल का मूल एग्रीमेंट समाप्त हो गया। इसके बाद एक नई, पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस एक पंक्ति के सहारे कंपनी को 2025 तक, यानी 5 अतिरिक्त वर्षों के लिए, पूरे प्रदेश का काम मिलता रहा। यह सवाल उठना लाजिमी है कि एक सरकारी विभाग को एक टेंडर प्रक्रिया पूरी करने में 5 साल से अधिक का समय क्यों लग रहा है? मशीनों की कीमत वसूल, फिर भी पूरा भुगतान क्यों?
इस पूरे मामले में हो रहे मनमाने भुगतान को लेकर इंदौर के अंकुश गिंदौड़िया ने एक शिकायत दर्ज कराई है। उनका आरोप है कि यह केवल सेवा विस्तार का मामला नहीं, बल्कि सरकारी खजाने को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाने का मामला है। अंकुश का तर्क है कि 2015 का टेंडर ‘बिल्ड-ऑन-ऑपरेट’ मॉडल पर था। 5 साल की अवधि में कंपनी को जो भुगतान किया गया, उसमें मशीनों की खरीद और स्थापना का भारी-भरकम पूंजीगत व्यय भी शामिल था। 2020 तक कंपनी अपनी मशीनों की पूरी कीमत वसूल चुकी थी। इसके बाद जब 2020 से 2025 तक सेवा विस्तार दिया गया, तो कंपनी को कोई नई मशीन नहीं खरीदनी थी। उसे केवल पहले से लगी हुई मशीनों का रखरखाव करना था। ऐसे में भुगतान की दर में से पूंजीगत व्यय की राशि हटा दी जानी चाहिए थी और केवल रखरखाव का खर्च दिया जाना चाहिए था। लेकिन विभाग ने पुरानी दर पर ही भुगतान जारी रखा। अंकुश ने अपनी शिकायत में कहा, ‘अन्य राज्यों में ऐसे अनुबंधों के विस्तार पर केवल रखरखाव के लिए 350-400 रुपए प्रति उपकरण प्रति माह की दर से भुगतान किया जाता है। मगर, मध्य प्रदेश में कंपनी को हर मशीन के लिए 1254 रुपए प्रति माह का भुगतान किया जाता रहा, जो सीधे तौर पर फर्म को अनुचित वित्तीय फायदा पहुंचाना है।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *