स्लीप एपनिया… एक ऐसी बीमारी जिसके बारे में मरीज को जब तक पता चलता है, ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन और डायबिटीज जैसी बीमारियों के होने का खतरा बढ़ जाता है। सिर्फ यही नहीं, बीमारी ज्यादा बढ़ जाए तो हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक की भी आशंका रहती है। एम्स भोपाल और आईसीएमआर की संयुक्त स्टडी के मुताबिक मप्र में नींद से जुड़ी शिकायतें लेकर आने वालों में 32% लाेग इस बीमारी से पीड़ित हैं। एम्स के पल्मोनरी विभागाध्यक्ष डॉ. अल्केश खुराना का कहना है कि सोते समय खर्राटे, जागने पर थकान या दिन में भी झपकी आना… लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते। लेकिन, ये संकेत बताते हैं कि नींद का साइकल ठीक नहीं है और स्लीप एपनिया का खतरा है। एम्स की स्लीप लैब में महज 500 रुपए में स्लीप स्टडी करवाई जा सकती है। भास्कर रिपोर्टर ने खुद एक रात लैब में बिताकर पूरी प्रोसेस जानी। एम्स की स्लीप लैब में रिपोर्टर ने बिताई रात… पेश है लाइव रिपोर्ट स्टेप 1: शुरुआती जांच और सवाल-जवाब
पहले कुछ ब्लड और सांस से जुड़े टेस्ट करवाए गए। रिपोर्ट आने के बाद करीब 20 सवाल पूछे…क्या रात में सांस रुकती है? खर्राटे आते हैं? सबसे अहम था, गाड़ी चलाते वक्त झपकी आई है? ज्यादातर जवाब हां में सुनने के बाद कहा-स्लीप स्टडी जरूरी है। स्टेप 2: एडमिशन और स्लीप लैब में एंट्री
फिर एंट्री हुई एयर-टाइट, साउंडप्रूफ स्लीप लैब में। अच्छे होटल जैसा कमरा। मरीज के लिए डबल और परिजन के लिए अलग सिंगल बेड। यहां पूरे 8 घंटे सोना था। सारे गैजेट्स स्विच ऑफ करा दिए गए। स्टेप 3: शरीर पर तारों का जाल
टेक्नीशियन आते हैं और कहते हैं, थोड़ा सहयोग कीजिए। पहले पॉलीसोमनोग्राफी मशीन फिर एक-एक कर कई सेंसर लगाए गए। गले/नाक के पास स्नोर माइक्रोफोन, सांस प्रवाह को मापने के लिए नाक में कैनुला, अंगुली में पल्स ऑक्सीमीटर, दिमाग की तरंगें नापने के लिए सिर पर इलेक्ट्रोड और सांस की मूवमेंट के लिए छाती और पेट पर सेंसर लगाए गए। स्टेप 4: 4 घंटे तक मशीनों में रिकॉर्डिंग
नींद शुरू हुई। चार घंटे तक खर्राटे, सांस रुकना व ऑक्सीजन गिरना सारी जानकारी मशीनों के जरिये कंट्रोल रूम और नाइट विजन कैमरे में रिकॉर्ड हुआ। स्टेप 5: फिर लगाई गई सीपैप मशीन
4 घंटे बाद सभी माइक्रोफोन हटाकर नाक पर सीपैप मशीन लगाई गई। यह नींद में श्वांस नली को खुला रखती है। इसके साथ बेहद गहरी नींद आई। सुबह 6 बजे जगाया। रिपोर्ट बनी।


