एलिवेटेड कॉरिडोर पर प्रशासन की तैयारी पर सवाल:अधूरे कामों को लेकर इंदौर हाईकोर्ट ने लगाई फटकार- काम चाहिए, बहाने नहीं

शहर के एलिवेटेड कॉरिडोर, सेंट्रल डिवाइडर और बीआरटीएस से जुड़े अधूरे कार्यों को लेकर हाईकोर्ट ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला ने टेंडर दस्तावेज की अस्पष्टता और निर्णयों में विरोधाभास पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ऐसी लापरवाही का खामियाजा अंततः आम जनता को भुगतना पड़ता है। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि जारी टेंडर दस्तावेज में कार्य के दायरे को लेकर स्पष्टता नहीं है। कहीं केवल स्क्रैप उठाने की बात कही गई, तो कहीं ध्वस्तीकरण और आदेश के अनुपालन का जिक्र नहीं मिला। इस पर जस्टिस शुक्ला ने चेतावनी दी कि ऐसी स्थिति आगे चलकर कानूनी विवाद को जन्म दे सकती है। सुनवाई में याचिकाकर्ता राजलक्ष्मी फाउंडेशन की ओर से सीनियर एडवोकेट अजय बगाडिया और एडवोकेट शिरीन सिलावट ने पक्ष रखा। काम चाहिए, बहाने नहीं अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उसका उद्देश्य किसी ठेकेदार को दंडित करना नहीं है, बल्कि शहर से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों को समय पर पूरा कराना है। जस्टिस शुक्ला ने यह भी पूछा कि यदि टेंडर प्रक्रिया बार-बार अटक रही है, तो क्या कार्य किसी सरकारी एजेंसी से नहीं कराया जा सकता। एलिवेटेड कॉरिडोर पर विरोधाभासी जवाब अधिकारियों के बयानों पर भी कोर्ट ने असंतोष जताया। एक तरफ कहा गया कि एलिवेटेड कॉरिडोर का काम शुरू हो चुका है, वहीं दूसरी ओर यह भी बताया गया कि पीडब्ल्यूडी फरवरी में काम शुरू करेगा। कोर्ट ने इस विरोधाभास को गंभीर माना। अधूरे डिवाइडर से बढ़ रही जनता की परेशानी सेंट्रल डिवाइडर और अस्थायी बैरिकेडिंग को लेकर अदालत ने कहा कि अधूरे निर्माण के कारण रोजाना ट्रैफिक जाम और दुर्घटनाओं की आशंका बनी हुई है। अधिकारियों ने 3.1 किमी का कार्य तीन महीने में पूरा करने की बात कही, लेकिन कोर्ट ने इस देरी पर चिंता जताई। 20 दिन का अल्टीमेटम, अगली सुनवाई 25 फरवरी सरकारी पक्ष ने टेंडर में हुई चूक स्वीकार करते हुए 20 दिन का समय मांगा, जिसे कोर्ट ने मंजूरी दी। साथ ही निर्देश दिए कि निर्माण कार्य ऐसा हो जिससे यातायात प्रभावित न हो। मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी 2026 को तय की गई है।

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