200 करोड़ रु. से बने 7 मंजिला एसएमएस सुपर स्पेशलिटी ब्लॉक में पेशाब बंद होना, किडनी में चोट या पथरी का तेज दर्द, किडनी में स्टेंट डालने जैसी मेडिकल इमरजेंसी पर भी तत्काल इलाज नहीं मिल रहा है। कई केसेज में तो एक सप्ताह तक मरीज को इंतजार करना पड़ता है। इसका कारण- इमरजेंसी ऑपरेशन थिएटर का नहीं होना है। ऐसे में मरीजों को इलाज के लिए निजी अस्पताल जाना पड़ रहा है। जबकि पिनाइल और टार्सन फ्रेक्चर ऐसे हैं, जिनका तुरंत ऑपरेशन करना जरूरी होता है। हर माह सुपर स्पेशलिटी ब्लॉक की यूरोलॉजी, नेफ्रोलॉजी और गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग में 25 से 30 मरीज पहुंचते हैं। यहां रूटीन ऑपरेशन तो हो जाते है लेकिन बड़े ऑपरेशन के लिए मरीज को भटकना पड़ता है। इसके अलावा पार्किंग और कैंटीन की सुविधा नहीं होने से भी खासी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि एसएसबी में 311 बेड संचालित हैं। जगह कम पड़ने लगी यूरोलोजी, नेफ्रोलॉजी एवं गेस्ट्रोएंट्रोलोजी में रोबोटिक सर्जरी, लेप्रोस्कोपिक, एंडोस्कोपी, डायलिसिस जैसी आधुनिक सुविधाओं के चलते तीन साल में तीन गुना मरीज बढ़े है। जिससे तीनों के आउटडोर और अन्य सुपर स्पेशलिटी खोलने के लिए जगह कम पड़ने लगी है। ऐसे में पास में खाली पड़ी जगह मिलने पर ही सुविधाएं बढ़ सकेगी। यह सुविधा भी नहीं सुपर स्पेशलिटी ब्लॉक में आने वाले मरीजों एवं परिजनों के लिए कैंटीन एवं पार्किंग की सुविधा भी नहीं है। जिससे उन्हें बाहर खाना पड़ता है। यहां तक कि मरीजों के परिजनों को ठहरने के लिए कॉटेज रुम तक नहीं होने से सर्दी-गर्मियों में दिन-रात इधर-उधर भटकने को मजबूर हैं। मरीज की गंभीर स्थिति होने पर वार्ड या आईसीयू के बाहर रहना पड़ता है। “तीनों सुपर स्पेशलिटी में इलाज की अच्छी सुविधा होने से मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। एसएसबी के पीछे खाली पड़ी जगह के लिए सरकार को पत्र लिखा है। जगह मिलने पर सुविधाओं का विस्तार किया जा सकेगा।”
-डॉ. दीपक माहेश्वरी, प्राचार्य, एसएमएस मेडिकल कॉलेज जयपुर “यूरोलॉजी, नेफ्रोलॉजी और गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी में मरीजों की संख्या दो से तीन गुना बढ़ गई है। इलाज की आधुनिक सुविधा के कारण आउटडोर, इनडोर की संख्या के हिसाब से जगह कम पड़ने लगी है। इमरजेंसी ओटी, पार्किंग, कैंटीन, कॉटेज रूम बनाना प्रस्तावित है।”
-डॉ. नचिकेत व्यास, अधीक्षक, सुपर स्पेशलिटी ब्लॉक


