बूंदी परकोटे के अंदर स्थापित लगभग ढाई सौ साल पुरानी हैरिटेज बिल्डिंग को संरक्षित करने के बजाय एसडीएम ने उसके छज्जे गिराने के ही आदेश निकाल दिए। यही नहीं, आदेश निकालकर चस्पा करने के अगले ही दिन उसे तोड़ने तक के लिए अमला पहुंच गया। बाद में कलेक्टर के हस्तक्षेप पर मामला आगे नहीं बढ़ा। आदेश वापस लेना पड़ा। बूंदी में तोपखाना हवेली के नाम से मशहूर यह भवन पूर्व में राजपरिवार की संपत्ति हुआ करती थी, जिसे आजादी के बाद स्टेट नजूल संपत्ति में शामिल कर लिया गया था। तब राजा-महाराजाओं से सरकार ने संपत्तियां ली थीं, जिनमें सरकारी विभागों के कार्यालय चल सकें। इस भवन में पिछले कुछ साल पहले तक सरकारी सहित बैंक कार्यालय आदि चला करते थे, लेकिन बाद में उनके नए भवन बनने पर वे यहां से शिफ्ट कर गए और यह हवेली जर्जर होती गई। म्यूजियम बनाए सरकार असल में इस हवेली का निर्माण प्राचीन समय में पत्थरों की इंटरलॉकिंग कर की गई थी। बाद में जब नजूल संपत्ति हुई और दफ्तर भी यहां से शिफ्ट हो गए तो यहां बनी जालियां, कंगूरे, एंटीक दरवाजे चोरी होने लगे। काफी कीमती सामान भी गायब हो गया। ऐसे में कुछ पत्थर ढीले हो गए। जबकि आज भी इसके बेसमेंट में हथियार-खाना बना हुआ है। हैरिटेज संरक्षण एक्सपर्ट अक्षय हाड़ा का कहना है कि पर्यटन और पुरातत्व विशेषज्ञों से रेस्टोर करके हाड़ौती के इतिहास का पैनोरमा और म्यूजियम यहां बनाया जाना चाहिए। एसडीएम ने 3 अक्टूबर को निकाला आदेश एसडीएम लक्ष्मीकांत मीना ने 3 अक्टूबर को आदेश निकाला कि तोपखाना चौगान गेट के अंदर की यह हवेली के छज्जे जीर्ण-शीर्ण हो गए हैं, इन्हें गिराया जाना अत्यावश्यक है। ऐसे में 5 अक्टूबर को तोड़ने की कार्रवाई की जाएगी। इस आदेश पर हैरिटेज संरक्षण से जुड़े लोगों ने आपत्ति जताई। बूंदी कलेक्टर अक्षय गोदारा तक शिकायत पहुंची। उन्हें आदेश की जानकारी लगी, उन्होंने कार्रवाई को आगे बढ़ाने जाने की मनाही की। आदेश से भ्रम हुआ : कलेक्टर गोदारा कलेक्टर गोदारा का कहना है कि यह नजूल संपत्ति है। कुछ पत्थर ढीले हो गए हैं। आदेश से भ्रम हो गया था, जिसे वापस ले लिया गया है। हम बजट सेंक्शन कराकर इसके रेस्टोरेशन की प्लानिंग कर रहे हैं। इसे पर्यटन भवन के रूप में विकसित किया जाएगा।


