7 किमी के ओंकार पर्वत की परिक्रमा की शुरुआत भगवान ओंकारेश्वर के दर्शन के बाद ओंकार मठ से की जाती है। शुरुआत से पर्यटन विभाग ने पत्थर पर गीता के श्लोक लिखकर शिला पटि्टकाएं लगाई हैं। ये शिला पट्टिकाएं कहीं-कहीं टूट चुकीं हैं तो किसी पर अतिक्रमण हो चुका है। परिक्रमा पथ की सीढ़ियां भी टूट रही हैं और रास्ता जगह-जगह खराब हो रहा है। 7 किमी के परिक्रमा पथ पर 3 किमी से ज्यादा पर अतिक्रमण है। कुछ पुराना है तो कुछ नया भी हो रहा है।
अतिक्रमण हर तरह का है। कहीं-कहीं रास्ता ही घेर लिया है। प्रतीक्षालय तो श्रद्धालुओं के बैठने लायक ही नहीं बचे हैं। गंदगी तो है ही, दुर्गंध भी आ रही है। बैठने के लिए जो पत्थर लगे हैं वे टूट रहे हैं। किसी-किसी में पशुओं ने गंदगी कर दी है। इसके अलावा पर्यटन विभाग ने पहाड़ पर नर्मदा नदी की तरफ एक व्यू पाइंट बनाया है। देखने में सुंदर है। लेकिन उसमें बैठने की जगह नहीं है। जालियां टूट चुकी हैं। बैठने के लिए लगे पत्थर भी टूट रहे हैं। सफाई व्यवस्था नहीं हैं। आस्था के इस ओंकार पर्वत परिक्रमा पथ पर न नगर परिषद का ध्यान है न जिला प्रशासन का। समय रहते देखरेख नहीं की गई और अतिक्रमण नहीं रोका गया तो ये ओंकार पर्वत पूरा घिर जाएगा। ^ पर्यटन विभाग और सिंहस्थ में परिक्रमा पथ को लिया गया है। सर्वे करवाया है। परिक्रमा पथ को सही करवाया जाएगा। प्रस्ताव भी भेजा है। -अनूप कुमार, कलेक्टर, खंडवा परिक्रमा पथ को सुरक्षित और संरक्षित करने की जरूरत: विवेकानंदपुरी ओंकारेश्वर भारत में एक मात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग जिसकी परिक्रमा की जाती है और ओंकार पर्वत मणिमय पर्वत है भारत में 12 ज्योतिर्लिंग में से सिर्फ ओंकारेश्वर ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जिसकी परिक्रमा की जाती है। ओंकार पर्वत मणिमय पर्वत है। यह शिवपुरी के नाम से विख्यात है। प्रकृति, पवित्रता और ऐतिहासिक महत्व के साथ इसकी पौराणिकता भी है। इस पर्वत पर दो मुख्य पुरातत्व कालीन मंदिर एक गौरी सोमनाथ मंदिर और दूसरा सिद्धनाथ महादेव मंदिर है। इसी के एक तट पर ऋण मुक्तेश्वर मंदिर है। परिक्रमा पथ पर चार द्वार भी हैं, जो लोग नर्मदा परिक्रमा नहीं कर पाते हैं। उसका फल भी ओंकार पर्वत की परिक्रमा से मिलता है। पर्वत के एक ओर नर्मदा नदी कल-कल बह रही है तो दूसरी ओर कावेरी। ऐसा लगता है कि ओंकार पर्वत ज्योतिर्लिंग है और बीच में दोनों नदियां जलहरी है। यहां नर्मदा और कावेरी का संगम भी है। ओंकार पर्वत की परिक्रमा सालभर होती है, लेकिन सबसे ज्यादा परिक्रमा सावन मास में की जाती है। गीता पथ पर लगीं गीता पटि्टका को विखंडित कर दिया गया है। हमारे लोग इस परिक्रमा पथ को दूषित करते हैं। हम अपने प्रतीकों का संर्वधन, सरंक्षण करें। हम उन्हें ऐसा बनाएं कि हमारी पीढ़ी पर एक अच्छा संदेश जाए। पौधारोपण करें और तीर्थ की गरिमा बनाए रखें। ओंकार पर्वत की शोभा भी नष्ट हो रही है। हम संकल्प लें कि ओंकार पर्वत के परिक्रमा पथ को सुरक्षित और संरक्षित बनाएं।


