कनाडा-अमेरिका और यूके से पहुंची हजारों संगत, अखंड कीर्तन और सिमरन में डूबी रही

भास्कर न्यूज |लुधियाना श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के पावन प्रकाश पर्व के अवसर पर मॉडल टाउन सिंह सभा गुरुद्वारा साहिब में चार दिवसीय अखंड कीर्तन समागम का आयोजन किया। इस समागम में देश-विदेश से अखंड कीर्तन व सिमरन में संगत ने भाग लिया। इस अवसर पर जत्थेदार बख्शीश सिंह ने बताया कि यह कीर्तन समागम वर्ष 1977 से निरंतर आयोजित किया जा रहा है। इसकी शुरुआत पंथ रत्न भाई रणधीर सिंह द्वारा की गई थी। उन्होंने कहा कि यह समागम केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गुरबाणी, सिमरन और सेवा के माध्यम से आत्मिक शांति प्राप्त करने का माध्यम है। इस समागम में डीआईजी, चीफ इंजीनियर, सेशन जज सहित अनेक प्रतिष्ठित लोग सेवा और संगत में मौजूद रहे। जत्थेदार बख्शीश सिंह ने बताया कि इस बार कनाडा, अमेरिका, यूके के अलावा दिल्ली, चंडीगढ़, उत्तर प्रदेश, कोलकाता, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू से संगत पहुंची है। दूर-दराज से आई संगत के ठहरने और लंगर की व्यवस्था गुरुद्वारा साहिब में की गई है। उन्होंने बताया कि रोज़ाना सुबह 2 बजे से अखंड कीर्तन आरंभ हो जाता है, जो निरंतर चलता रहता है। उन्होंने बताया कि गुरबाणी के साथ जुड़ने के लिए भाई रणधीर सिंह और कई लेखकों जिन्होंने किताबें लिखी है की किताबें संगत को फ्री में दी जाती है। पूर्व डीआईजी केवल सिंह ने कहा कि इस समागम में सिमरन और सेवा से जो आत्मिक शांति मिलती है, वह दुनिया में कहीं और नहीं मिल सकती। उन्होंने कहा कि यहां हर संगत गुरु स्वरूप नजर आती है और गुरु के ध्यान में जो सुकून मिलता है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। समागम में बच्चों को गुरबाणी पढ़ने, शुद्ध उच्चारण, मात्रा ज्ञान और श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी से गुरबाणी का सही पाठ करना सिखाया जाता है। जत्थेदार अमरजीत सिंह और बीबी मनमोहन कौर बच्चों के गुरबाणी टेस्ट लेते हैं। जो बच्चे परीक्षा में सफल होते हैं, उन्हें सम्मानित भी किया जाता है। उन्होंने बताया कि जो परीक्षा में पास होगा उसका आज अमृत संचार होगा। कनाडा से आई बच्ची गुरलीन कौर ने बताया कि वह ऑनलाइन गुरबाणी की क्लास लेती थी और अब यहां आकर परीक्षा देने आई है। उसने कहा कि यहां उसे गुरबाणी का शुद्ध उच्चारण, पाठ की गति और मात्रा पढ़ने की जानकारी मिली है। उसकी माता भी गुरबाणी कक्षाएं लेती हैं और वह भी इस परीक्षा में शामिल हुई हैं।

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