रेटिना के वायरल संक्रमण या वायरल रेटिनाइटिस का निदान कठिन है और इसका उपचार सर्जिकल रूप से भी चुनौतीपूर्ण होता है। यह संक्रमण तेजी से फैलता है और समय पर पहचान न होने पर स्थायी रूप से दृष्टि खराब हो सकती है। यह जानकारी एम्स भोपाल के नेत्र रोग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर और चीफ रेटिना सर्जन डॉ. समेंद्र कारखुर ने इटली में आयोजित प्रतिष्ठित ‘फ्लोरेटिना आईकूर 2025’ के दौरान दी। वे इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में गेस्ट फैकल्टी स्पीकर के रूप में शामिल हुए। इस वैश्विक आयोजन में 1600 से अधिक विशेषज्ञ शामिल हुए। दुनिया के चुनिंदा रेटिना सर्जनों में से एक के रूप में डॉ. कारखुर को मंच मिला। यह सम्मेलन 13वीं अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस थी, जिसका आयोजन प्रोफेसर स्टेनिसलो रिजो ने वर्ल्ड आरओपी कांग्रेस के सहयोग से किया। डॉ. कारखुर के व्याख्यान का मुख्य विषय रेटिना के वायरल संक्रमण की जटिलताओं का प्रबंधन और उसके परिणाम था। वायरल रेटिनाइटिस का इनको ज्यादा खतरा बच्चों में भी देखने को मिल रहा यह रोग
डॉ. कारखुर ने बताया, वायरल रेटिनाइटिस किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन यह खासतौर पर उन रोगियों में अधिक पाया जाता है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। उन्होंने यह भी बताया कि कई बार बच्चों में भी यह बीमारी देखी जाती है। चुनौतियों में एक यह भी है कि इसके शुरुआती लक्षण अन्य नेत्र रोगों जैसे दिखाई देते हैं, जिसके कारण गलत उपचार की संभावना बढ़ जाती है। गलत इलाज से बढ़ रही समस्या
कई मामलों में ऐसे मरीजों को सिर्फ स्टेरॉयड देकर इलाज किया गया, जिससे संक्रमण और तेजी से बढ़ा। डॉ. कारखुर ने चेताया कि वायरल रेटिनाइटिस में स्टेरॉयड का अनियंत्रित उपयोग बीमारी को ओवरड्राइव में ले जाता है, जिससे स्थिति अत्यधिक गंभीर हो सकती है। सही निदान, तुरंत रेफरल और अनुभवी रेटिना विशेषज्ञ के हस्तक्षेप से ही मरीज की दृष्टि बचाई जा सकती है। इलाज के तौर पर बार-बार इंट्रा-ऑक्यूलर इंजेक्शन, इंट्रावीनस थेरेपी और कई मामलों में समय पर रेटिना सर्जरी बेहद प्रभावी साबित होती है।


