करोड़ों का नया बस स्टैंड वीरान पड़ा फाइलों में आवारा कुत्तों की नसबंदी

भास्कर न्यूज | कोंडागांव जिले में करोड़ों की लागत से बने बस स्टैण्ड के विरान होने और आवारा कुत्तों की नसबंदी बंद होना प्रशासनिक संवेदनहीनता और लचर अमले की पोल खोल रही है, जिन पर देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट तक को संज्ञान लेना पड़ा। बावजूद इसके, हालात जस के तस बने हुए हैं। न तो करोड़ों की लागत से बनाया नया बस स्टैंड जनता के काम आ रहा है। आवारा कुत्तों का आतंक, नसबंदी योजना ठप : दूसरी तरफ शहर में तेजी से बढ़ रही आवारा कुत्तों की आबादी से जुड़ी है। आवारा कुत्तों को मारा नहीं जा सकता, लेकिन उनकी नसबंदी कर आबादी नियंत्रित करने के स्पष्ट निर्देश हैं। इस विषय में भी हालात इतने गंभीर हुए कि सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। कोर्ट ने निर्देश दिए कि नगर पालिकाएं कुत्तों को पकड़े उनके लिए शेल्टर होम बनाए नियमित रूप से नसबंदी अभियान चलाए। जिले में नगर पालिका द्वारा एक वेटनरी अधिकारी के आवास को ही शेल्टर होम घोषित कर दिया गया। दावा किया गया कि यहीं आवारा कुत्तों की नसबंदी होगी। लेकिन सच्चाई यह है कि अब तक इस शेल्टर होम में एक भी कुत्ते की नसबंदी नहीं हो सकी है। इधर रोज़ाना डॉग बाइट के मामले बढ़ रहे हैं बच्चे, बुजुर्ग और राहगीर सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं। यह सबसे चिंताजनक तथ्य है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जैसे संवैधानिक संस्थानों के निर्देशों के बाद भी न बस स्टैंड सुचारु रूप से शुरू हो पाया न ही आवारा कुत्तों की नसबंदी का काम शुरू हो सका। उप संचालक पशु विभाग डॉ एमबी सिंह ने कहा अभी स्ट्रीट डॉग की नसबंदी शुरू नहीं की है व्यवस्था कर रहे हैं आवास उपलब्ध हुआ है नगर पालिका जैसे ही कुत्तों को लाती है नसबंदी शुरू कर दी जाएगी। प्रस्ताव भेजा गया: कलेक्टर नूपुर राशि पन्ना ने कहा जल्द ही बाईपास के साथ ही नये बस स्टैंड को भी चालू कर रहे हैं जिससे यातायात सुगम होगा भारी वाहनों का प्रवेश शहर में नहीं होगा। स्ट्रीट डॉग की नसबंदी के लिए और उनकी देखरेख के लिए प्रथम चरण में 20 लाख का प्रस्ताव बनाकर भेजा गया है। 7 करोड़ रुपये की लागत से बना नवीन बस स्टैंड दो साल पहले ही पूर्ण हो चुका है। बस स्टैंड की दुकानें भी नीलाम हो चुकी हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि आज तक बसें यहां नियमित रूप से नहीं रुकतीं। इस मुद्दे पर जब खबर प्रकाशित हुई तो हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। कोर्ट की सख्ती के बाद एक-दो दिन तक बसें रुकीं, लेकिन उसके बाद फिर वही स्थिति बस स्टैंड वीरान और यात्री सड़कों पर भटकते नजर आए। स्पष्ट है कि जब तक प्रशासनिक स्तर पर कड़ाई नहीं होगी, बस संचालक मनमानी करते रहेंगे। आज हालत यह है कि करोड़ों की सार्वजनिक संपत्ति कबाड़ में तब्दील हो रही है और यात्री असुविधा झेल रहे हैं।

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