विपिन दुबेहाइड्रोलॉजिस्ट एक्सपर्ट के साथ ठाकुरराम यादव राजधानी रायपुर के कुछ इलाकों में 60 से 80 फीट में ही पानी मिल जा रहा है। कहीं-कहीं पर 1200 फीट की खुदाई करने के बाद भी पानी नहीं मिल रहा है। राजधानी रायपुर में मिट्टी भी अलग-अलग है। कई जगहों पर ऊपरी सतह की खुदाई के बाद छूही (पीली मिट्टी) निकल आती है। यह मिट्टी पानी को रोकती है। इसलिए ऐसी जगहों पर पानी नहीं होता। मिट्टी के नीचे पानी संरक्षित करने वाली चट्टानें भी अलग-अलग सतहों पर है। ऐसी स्थिति में वाटर रिचार्ज के लिए कोई एक सिस्टम कारगर नहीं हो सकता। राजधानी रायपुर में ग्राउंड वाटर रिचार्ज के लिए एक वृहद कार्ययोजना बनाने की जरूरत है। अब तक अलग-अलग एजेंसियां ग्राउंड वाटर के लिए अलग-अलग काम करती रही हैं। सभी को मिलकर एक वृहद प्लान बनाकर काम करने की दिशा में केंद्र सरकार का शैले एक्विफर मैनेजमेंट एसएएम-2.0 कारगर साबित हो सकता है। भारत सरकार के शहरी और आवासन कार्य मंत्रालय के तहत नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर अर्बन अफेयर ने काम शुरू किया है। नाबार्ड कंसल्टेंसी सर्विसेस को रायपुर में इसके लिए क्लस्टर पार्टनर नियुक्त किया गया है। रायपुर में वाटर रिचार्ज के लिए कोई भी प्लान तैयार करने से पहले रायपुर की मिट्टी की जांच करनी होगी। शहर में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग मिट्टी है। यही नहीं, जमीन के नीचे पानी स्टोर करने वाले चट्टान भी कहीं 40 से 50 फीट नीचे मिल जा रहे हैं। कहीं-कहीं पर यह 800-900 फीट के नीचे हैं। इतनी गहराई में चट्टान मिलने के बाद भी यह दावा नहीं किया जा सकता है कि उस चट्टान में पानी संग्रहित करने वाले क्रेक्स हैं। रायपुर में वाटर रिचार्ज के पहले शहर के व्यापक अध्ययन की जरूरत है। इसके लिए शहर में काम करने वाली अलग-अलग सरकारी एजेंसियों और प्राइवेट फर्मों से डेटा कलेक्शन की जरूरत है। नगर निगम, जल संसाधन विभाग, केंद्रीय भूजल बोर्ड इत्यादि से डेटा कलेक्शन करने के बाद उसका अध्ययन करना होगा। सिस्टम लगाने के बाद मानिटरिंग भी जरूरी केंद्र सरकार की योजना के तहत रायपुर में वृहद अध्ययन के बाद व्यापक तौर पर वाटर रिचार्ज सिस्टम लगाने के बाद उसकी मानिटरिंग भी जरूरी है। यह देखना होगा कि लगाए गए सिस्टम का असर हमारे तालाबों, कुआं और बोरवेल्स पर हो रहा है या नहीं। यदि किसी क्षेत्र में व्यापक तौर पर सिस्टम लगाए गए। सिस्टम लगाने के बाद भी उस इलाके के बोरवेल्स सूखे ही हैं, कुआं में पानी नहीं और तालाब भी मरणासन्न हैं तो ऐसे सिस्टम कोई काम के नहीं।


