पिछले साल प्रदेश में हुई कुल 32 किन्नरों (ट्रांसजेंडर) की मौत के सरकारी आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इनमें से 11 यानी 34.38% की उम्र एक साल से कम थी। इनमें 10 शहरी और 1 ग्रामीण क्षेत्र से थे। यह सवाल उठता है कि कहीं नवजात की पहचान किन्नर के रूप में होने के बाद उन्हें जानबूझकर तो नहीं मार दिया गया? सांख्यिकी विभाग की ओर से जारी जन्म-मृत्यु पंजीकरण के अनुसार, मरने वाले किन्नरों में 50% की उम्र 25 साल से कम थी। इन 32 मौतों में से 20 शहर और 12 ग्रामीण क्षेत्रों में दर्ज हुईं। तुलना में देखें तो, साल 2024 में कुल मौतों में एक साल तक के लड़के 2.88% और लड़कियां 2.79% थीं। पूरे साल में कुल 4,74,072 लोगों की मृत्यु दर्ज की गई। विशेषज्ञों का कहना है कि असल में ट्रांसजेंडर बच्चों की मौतों का आंकड़ा इससे बड़ा हो सकता है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में रजिस्ट्रेशन कम होता है। साथ ही सामाजिक बहिष्कार, भेदभाव और हिंसा के कारण मृत्यु की संभावना और बढ़ जाती है। पुष्पा माई ने कहा- ऐसे बच्चों के माता-पिता की काउंसलिंग जरूरी महामंडलेश्वर किन्नर अखाड़ा राजस्थान और नई भोर संस्था की संस्थापक, पुष्पा माई का कहना है कि जो बच्चे एक साल से कम उम्र में मर रहे हैं, वे हम तक पहुंच ही नहीं पाते। ऐसे बच्चों के माता-पिता की काउंसलिंग जरूरी है। सरकार को मौतों की जांच करानी चाहिए, ताकि स्पष्ट हो सके कि उन्हें जानबूझकर तो नहीं मारा गया। पहले बच्चे किन्नर समुदाय को सौंपते थे, लेकिन 2022 के एक भी बच्चा नहीं पहुंचा। यह हैं बड़ी मुश्किलें


