कृषि विभाग:डीएपी जैसी जिप्सम की काली गोलियों के जाल की परतें खुलनी शुरू, सीज फैक्ट्री से अब सप्लाई नेटवर्क पर नजर

जामसर-दाउदसर रोड पर शुक्रवार को सीज की गई संदिग्ध उर्वरक फैक्ट्री अब केवल एक जब्ती की घटना नहीं रह गई है, बल्कि यह एक बड़े नेटवर्क के जांच की शुरुआत नजर आ रही है। कृषि विभाग ने 10 हजार बैग जिप्सम के दानों/काली गोलियों का स्टॉक जब्त कर फैक्ट्री सील की थी। अब विभाग का फोकस इस बात पर है कि यह माल कहां सप्लाई होना था और इससे पहले कितना माल बाजार में खपाया जा चुका है। प्राथमिक जांच में सामने आया है कि फैक्ट्री लंबे समय से बंद दर्शाई जा रही थी, लेकिन भीतर स्टॉक पैक कर बाहर भेजने की तैयारी थी। यही तथ्य विभागीय अधिकारियों के शक को मजबूत करता है कि यहां तैयार सामग्री का उपयोग डीएपी में मिलावट या नकली उर्वरक के रूप में बिक्री के लिए किया जाता रहा होगा। सहायक निदेशक (कृषि) सुरेंद्र कुमार मारू के नेतृत्व में की गई कार्रवाई के बाद अब कानूनी और तकनीकी जांच साथ-साथ चल रही है। विभाग कारोबारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया में है। नमूने प्रयोगशाला भेजे जा चुके हैं। शुक्रवार की कार्रवाई के बाद फॉलोअप जांच तेज, जिप्सम से डीएपी मिलावट की आशंका, एफआईआर और बाहरी राज्यों तक रेकी की तैयारी मिलावटी डीएपी या नकली खाद फसल की शुरुआती वृद्धि को प्रभावित करती है। किसान महंगा दाम देकर भी अपेक्षित परिणाम नहीं पाता। मिट्टी की सेहत बिगड़ती है, उत्पादन घटता है और अगली फसल पर भी असर पड़ता है। ऐसे रैकेट कृषि अर्थव्यवस्था की जड़ों को कमजोर करते हैं। यह मामला अब सिर्फ जब्ती की खबर नहीं, बल्कि कृषि इनपुट सप्लाई सिस्टम की गहराई में छिपे खेल की जांच में बदल चुका है। आगे की जांच तय करेगी कि यह फैक्ट्री एक कड़ी थी या बड़े जाल का हिस्सा। जांच अब इन बिंदुओं पर केंद्रित फैक्ट्री से तैयार जिप्सम की काली गोलियों की सप्लाई किन फर्मों को होनी थी। क्या यह सामग्री डीएपी या अन्य उर्वरक में मिलावट के लिए इस्तेमाल होती थी। जब बाजार में डीएपी/यूरिया की कमी नहीं, तब इतना स्टॉक क्यों तैयार किया गया। पहले भी यहां से माल की अन्य राज्यों में ढुलाई हुई या नहीं। बिना ब्रांड और ब्रांड वाले बैग की पैकिंग किसके निर्देश पर की जा रही थी। जरूरत पड़ने पर कृषि विभाग की टीम को राजस्थान से बाहर भी जांच के लिए भेजा जा सकता है। अधिकारियों के अनुसार जिप्सम सामान्यतः मिट्टी की छार कम करने में उपयोगी है, लेकिन इसे इस तरह गोलियों के रूप में बनाकर पैक करना असामान्य माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार की गोलियां सीधे खेत में नहीं डाली जातीं। यही वजह है कि विभाग को आशंका है कि इसे मिलावटी डीएपी के रूप में खपाया जाता होगा। कच्चे जिप्सम की लागत लगभग एक रुपए/किलो या कम होती है। 50 किलो का बैग तैयार करने की लागत बेहद कम होती है। जबकि बाजार में उर्वरक बैग की कीमत 1350 रुपए रियायती दरों पर होती है। यानी मामूली लागत से भारी वसूली। लेकिन खेत में असर? फसल कमजोर, उत्पादन कम, मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित। किसान असली समझकर जो खेत में डालता है, वही उसकी फसल की किस्मत तय करता है। ऐसे में जांच तय करेगी कि यह मामला एक फैक्ट्री तक सीमित था या किसी बड़े जाल की कड़ी है। “स्टॉक सीज है, सुरक्षा के इंतजाम किए गए हैं। नमूनों की रिपोर्ट आने के बाद सख्त कानूनी कार्रवाई होगी। हम यह भी पता लगाएंगे कि यह माल कहां भेजा जाना था। जरूरत पड़ी तो राज्य से बाहर भी जांच करेंगे।” -सुरेंद्र मारू, सहायक निदेशक (कृषि विभाग), बीकानेर

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